रावण भी इंसान था, उसको बड़ा अभिमान था,
दीपक कैंतुरा की कलम से
ब्रह्मांड का ज्ञाता था, विद्वानों में महान था।
बलशाली, गुणवान था, राजनीति का ज्ञान था,
शिवभक्ति में लीन सदा, फिर भी अहंकार महान था।
हर साल मेरा दहन करो, ये कैसा इंसाफ है
मेरे पुतले को जलाते हो, मन में फिर क्यों पाप है
बेटी रोती न्याय को, लुटता गरीब का मान है
इतने अत्याचार देखकर, प्रभु राम क्यों मौन हैं
रावण ने राम से पूछा, सुनिए प्रभु श्रीराम
कलियुग में क्यों बढ़ रहा, अन्याय और संग्राम
झूठ यहाँ सम्मानित है, सच क्यों परेशान है
मेरे पुतले को जलाने आया, इस भीड़ में राम कौन है
माथे पर तिलक लगाए, मुख में राम का नाम है,
कर्मों में छल-कपट भरा, कैसा ये इंसान है
दूसरों के दोष गिने, खुद से मगर अनजान है,
मेरे दस सिर जलाने आया, भीतर दस अवगुण विराजमान हैं
राम अगर मर्यादा हैं, सत्य और सम्मान हैं
दीन-दुखी की सेवा ही, सच्चे धर्म की शान है
पहले मन का मैल धोओ, छोड़ो झूठी शान
रावण का पुतला बाद में जलाना, पहले जलाओ अभिमान