मोकामा में उमड़ा आस्था का जनसैलाब: पितृपक्ष में तर्पण कर पितरों का लिया आशीर्वाद
मोकामा: भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाले 16 दिवसीय पितृपक्ष के पावन अवसर पर मोकामा के विभिन्न गंगा तटों और जलाशयों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं का निर्वहन करते हुए लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए भक्तिभाव से जल अर्पित (तर्पण) कर रहे हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों के बीच आचार्य राधे पांडे ने काले तिल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया, "पितृपक्ष में तर्पण के दौरान काले तिल का उपयोग सबसे प्रमुख माना गया है। जल में काला तिल मिलाकर पितरों को अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।"
वहीं स्थानीय पंडित लाल जी मिश्रा ने बताया, "तर्पण में जौ और अक्षत अर्पित करने से देवता प्रसन्न होते हैं। इस दौरान सफेद फूल, काला तिल, फल, कुशा और जौ का विशेष प्रयोग किया जाता है।" धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हाथ की अंगूठे के पास वाले भाग (पितृ तीर्थ) से दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुशा युक्त जल 3 बार गिराने से पूर्वजों को तुरंत तृप्ति प्राप्त होती है।
तर्पण की प्रक्रिया में मुख्य रूप से तीन पीढ़ियों—पिता, दादा और परदादा—तथा अपने गोत्र के पितरों का नाम लेकर जल दिया जाता है। लोक परंपराओं के अनुसार तर्पण मुख्य रूप से तीन दिनों तक विशेष रूप से किया जाता है। इसका कारण 'तीन खूंट' में लगने वाला सूतक और संबंध है:
पहला खूंट: अपने निज वंश और घर-परिवार के पूर्वज।
दूसरा खूंट: ननिहाल पक्ष के पूर्वज।
तीसरा खूंट: ससुराल पक्ष के पूर्वज।
इन तीनों खूंटों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए ही तीन दिनों का विशेष तर्पण विधान प्रचलित है। मोकामा में पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही यह परंपरा आज भी भावी पीढ़ी को अपनी जड़ों और संस्कारों से जोड़े हुए है।
Mokameh, Patna | Sep 29, 2026