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🌿 शरद ऋतु में विरेचन चिकित्सा का विशेष महत्व🌿
आयुर्वेद में विरेचन (Virechana) पंचकर्म की प्रमुख शोधन प्रक्रियाओं में से एक है। आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार इसका विशेष संबंध पित्त दोष के शोध से माना गया है। 🍃
विरेचन केवल सामान्य पेट साफ करने की प्रक्रिया नहीं है। योग्य आयुर्वेद चिकित्सक व्यक्ति की प्रकृति, कोष्ठ, उम्र, शारीरिक शक्ति और स्वास्थ्य की स्थिति का आकलन करने के बाद इसकी योजना बनाते हैं। आवश्यकता के अनुसार पूर्वकर्म में स्नेहन एवं स्वेदन जैसी प्रक्रियाएँ भी की जा सकती हैं।
🍂 आयुर्वेदिक ग्रंथों में शरद ऋतु को पित्त प्रकोप से जोड़ा गया है, इसलिए इस ऋतु में उचित चिकित्सकीय आकलन के बाद विरेचन का विशेष महत्व बताया गया है।
आयुर्वेद में विरेचन का वर्णन सोरायसिस, एक्जिमा, मुहाँसे, दाद, पुरानी एलर्जी, पिगमेंटेशन, पाचन एवं लिवर संबंधी विकारों तथा कुछ स्थितियों जैसे मोटापा, मधुमेह, पुराने सिरदर्द/माइग्रेन, अस्थमा और बढ़े हुए यूरिक एसिड के संदर्भ में भी मिलता है। किसी भी बीमारी में इसकी उपयुक्तता व्यक्ति की स्थिति के अनुसार चिकित्सक द्वारा तय की जानी चाहिए। 👨⚕️
⚠️ विरेचन स्वयं घर पर न करें। इसे योग्य आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह एवं निगरानी में ही करवाएँ।
🏥 शिवप्यारी देवी रुन्थ्ला आयुष नर्सिंग एवं प्रशिक्षण संस्थान
📍 वार्ड नंबर 42, मोर राजकीय कन्या विद्यालय के पास, नवलगढ़, झुंझुनू, राजस्थान
👨⚕️ डॉ. राकेश माहिच
👨⚕️ डॉ. रविकांत शर्मा
👩⚕️ डॉ. अल्का नारनोलिया
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Nawalgarh, Jhunjhunu | Sep 30, 2026