पराली जलाने पर रोक के दावे कागजों में, खेतों में रोज लग रही आग! प्रशासन की निगरानी पर उठे सवाल
झालीपुरा से चन्द्रेसल और खेड़लियों पांडे तक धान कटाई के बाद धड़ल्ले से जलाई जा रही पराली, पर्यावरण के साथ खेती और पेड़-पौधों को भी हो रहा नुकसान
कोटा। पराली जलाने पर रोक लगाने को लेकर हर साल प्रशासन की ओर से बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। किसानों को जागरूक करने, अभियान चलाने और नियमों की पालना कराने की बातें भी सामने आती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से अलग नजर आ रही है। धान की कटाई के बाद खेतों में लगातार पराली जलाई जा रही है, जबकि इसे रोकने के लिए जिम्मेदार विभागों की सक्रियता दिखाई नहीं दे रही।
झालीपुरा, चन्द्रेसल, खेड़लियों पांडे और रामखेड़ली क्षेत्र में धान की कटाई के बाद खेतों में पराली जलाने का सिलसिला फिर शुरू हो गया है। इससे जहां वायु प्रदूषण बढ़ने का खतरा है, वहीं मिट्टी की उर्वरता और खेतों के आसपास मौजूद पेड़-पौधों को भी नुकसान पहुंच रहा है। गर्मियों में गेहूं की कटाई के बाद भी इसी तरह खेतों में आग लगाने की घटनाएं सामने आती हैं।
एक किसान की मेहनत पर आग का खतरा
खेड़लियों पांडे में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहे 'कोवाना नेचुरल फार्म' की संचालक एवं पूर्व प्रधानाचार्य प्रभा कौशिक ने बताया कि उन्होंने फार्म में 500 से अधिक पेड़ लगाए हैं। पिछले साल गेहूं की कटाई के बाद आसपास के खेतों में पराली जलाने से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा था। आग की चपेट में आने से पूरा ड्रिप सिंचाई सिस्टम और एक झोपड़ी जलकर नष्ट हो गई थी। बाद में उन्हें अपने स्तर पर दोबारा ड्रिप सिस्टम लगवाना पड़ा।
प्रभा कौशिक के अनुसार, उस समय आपातकालीन नंबर पर भी सूचना दी गई, लेकिन कोई मदद नहीं मिल सकी। इस बार उन्होंने करीब एक सप्ताह पहले ही 1500 नए पौधे लगाए थे। ऐसे में आसपास के खेतों में पराली जलाने से इन पौधों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा।
सरकारी मदद का इंतजार छोड़ खुद संभाली जिम्मेदारी
प्रभा कौशिक ने बताया कि इस बार सरकारी सहायता का इंतजार करने के बजाय अपने संसाधनों से ही आग पर काबू पाने की व्यवस्था करनी पड़ी। पेड़-पौधों की सुरक्षा के लिए दिन-रात कर्मचारियों की निगरानी लगाई गई। हाल ही में जलती पराली की आग को बड़ी मुश्किल से बुझाया गया। रात के समय भी आग लगने पर वहां मौजूद श्रमिकों ने काफी मशक्कत के बाद उसे फैलने से रोका।
जिम्मेदार विभागों की निगरानी कहां?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हर साल पराली जलाने का समय पहले से तय होता है, तो कृषि विभाग और प्रशासन की ओर से पहले से प्रभावी निगरानी क्यों नहीं की जाती? किसानों को जागरूक करने के अभियान केवल कागजों तक सीमित क्यों नजर आते हैं? खेतों में आग लगाने वालों को रोकने और नियमों की पालना सुनिश्चित करने के लिए मौके पर जिम्मेदार अधिकारी क्यों नहीं दिखाई देते?
पराली जलाने से होने वाला नुकसान केवल प्रदूषण तक सीमित नहीं है। इसकी आग आसपास के खेतों, बागवानी, सिंचाई व्यवस्था और वर्षों की मेहनत से लगाए गए पेड़-पौधों को भी तबाह कर सकती है।
अब जरूरत केवल जागरूकता के दावों की नहीं, बल्कि खेतों तक पहुंचकर निगरानी करने, किसानों को पराली के वैकल्पिक निस्तारण के तरीके बताने और आग की घटनाओं पर समय रहते कार्रवाई करने की है। सवाल यही है कि प्रशासन इस बार भी खेतों में उठते धुएं को देखकर अनदेखा करेगा या धरातल पर कोई ठोस कदम उठाएगा?
Ladpura, Kota | Nov 2, 2026