जब भी पूर्णिया के सांसद Pappu Yadav किसी पीड़ित परिवार से मिलते हैं और ₹5,000, ₹10,000 या अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहायता देते हैं, तो कुछ लोग उसका मज़ाक उड़ाने लगते हैं। कहा जाता है कि यह दिखावा है, ड्रामा है, राजनीति है। लेकिन सवाल यह है कि जब किसी परिवार पर अचानक दुख का पहाड़ टूटता है, तब सबसे पहले मदद के लिए कौन खड़ा होता है?
सोशल मीडिया पर टिप्पणी करना बहुत आसान है, लेकिन किसी के घर में मौत हो जाए, दुर्घटना हो जाए या कोई बड़ी त्रासदी आ जाए, तब क्या समाज के लोग जाकर पूछते हैं कि घर में राशन है या नहीं? बच्चों के खाने की व्यवस्था कैसे होगी? अंतिम संस्कार या क्रिया-कर्म का खर्च कैसे निकलेगा? अधिकांश लोग केवल दो शब्द की सहानुभूति देकर आगे बढ़ जाते हैं।
ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति, चाहे वह सांसद हो, नेता हो या आम नागरिक, आर्थिक सहयोग करता है तो उसका सम्मान होना चाहिए, उपहास नहीं। यह सच है कि ₹5,000 या ₹10,000 किसी की जिंदगी नहीं बदल देता, लेकिन संकट की घड़ी में यही राशि परिवार के लिए बड़ी राहत बन जाती है। किसी का एक दिन का खर्च निकल जाता है, किसी का एक सप्ताह संभल जाता है, किसी के बच्चों के लिए भोजन की व्यवस्था हो जाती है।
मदद की कीमत उसकी राशि से नहीं, बल्कि उसके समय और भावना से तय होती है। जो लोग मज़ाक उड़ाते हैं, उन्हें एक बार स्वयं से पूछना चाहिए कि यदि उनके पड़ोस या रिश्तेदारी में कोई संकट आए तो वे कितनी मदद करने को तैयार हैं।
आलोचना करना आसान है, लेकिन दुख की घड़ी में किसी का हाथ थामना मुश्किल। यदि कोई पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होकर उसे थोड़ी भी राहत देता है, तो उसकी नीयत और प्रयास की सराहना होनी चाहिए, क्योंकि संकट के समय छोटी मदद भी बहुत बड़ी होती है।
Rajesh Ranjan #CFN
Purnea East, Purnia | Jun 22, 2026