"सरकारी गवाह बन जाओ तो मुकदमे से नाम कटवा दूंगा..."
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बाबूराम के बेटे ने वायरल की कथित कॉल रिकॉर्डिंग, क्षेत्र में तेज हुई सियासी बहस
पट्टी/प्रतापगढ़। थाना पट्टी में दर्ज मु0अ0सं0-227/2026 को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। मामले में नामजद बाबूराम यादव के पुत्र द्वारा एक कथित कॉल रिकॉर्डिंग वायरल किए जाने के बाद क्षेत्र में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। वायरल ऑडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन इसे लेकर गांव से लेकर सोशल मीडिया तक कई सवाल उठ रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानी चुनाव की पुरानी रंजिश अब भुनाई जा रही है?
मामले में नामजद बाबूराम यादव पहले ही वीडियो जारी कर आरोप लगा चुके हैं कि उन्हें और ग्राम प्रधान इंद्रधर दूबे उर्फ छोटे दूबे के समर्थकों को राजनीतिक रंजिश के चलते निशाना बनाया जा रहा है। उनका दावा है कि जिन्होंने ग्राम पंचायत चुनाव में अरविंद मिश्रा का समर्थन नहीं किया था, उन्हें अब विभिन्न मुकदमों और पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है।
क्षेत्र में चर्चा है कि वायरल हुई कथित कॉल रिकॉर्डिंग में सरकारी गवाह बनने और मुकदमे से नाम हटवाने जैसी बातें सामने आई हैं। हालांकि रिकॉर्डिंग की सत्यता की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही संबंधित पक्ष की ओर से इस संबंध में कोई बयान जारी किया गया है।
गौरतलब है कि 30 मई 2026 की घटना के संबंध में अरविंद कुमार मिश्रा की तहरीर पर थाना पट्टी में मु0अ0सं0-227/2026 दर्ज किया गया था। आरोप था कि सत्यम दुबे, शशिधर दुबे, मनीष मिश्रा सहित अन्य नामजद एवं 80-90 अज्ञात व्यक्तियों ने दुकान एवं मकान पर कब्जे का प्रयास किया, विरोध करने पर मारपीट की तथा जेसीबी से संपत्ति क्षतिग्रस्त कर दी।
31 मई 2026 को पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सत्यम दुबे, शशिधर दुबे उर्फ भोला और मनीष मिश्रा को गिरफ्तार किया था। बाद में तीनों अभियुक्त जमानत पर रिहा हो गए। वहीं शेष अभियुक्तों की गिरफ्तारी अभी भी नहीं हो सकी है।
इसके बाद 3 जून 2026 को पुलिस अधीक्षक प्रतापगढ़ द्वारा मामले में वांछित 10 अभियुक्तों पर ₹10,000-₹10,000 का पुरस्कार घोषित किया गया, जिनमें ग्राम प्रधान इंद्रधर दुबे उर्फ छोटे दूबे का नाम भी शामिल है।
क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि प्रधानी चुनाव की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का असर आज भी स्थानीय समीकरणों पर दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों का एक वर्ग मानता है कि चुनावी हार-जीत के बाद पैदा हुई खींचतान अब विभिन्न घटनाओं और मुकदमों के रूप में सामने आ रही है। हालांकि इन चर्चाओं के समर्थन में कोई आधिकारिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
फिलहाल पूरा मामला पुलिस विवेचना और न्यायालय के विचाराधीन है। एक पक्ष इसे कानून-व्यवस्था और भूमि विवाद से जुड़ा गंभीर मामला बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक रंजिश और चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने की कार्रवाई करार दे रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह केवल जमीनी विवाद है, या इसके पीछे पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी काम कर रही है?
इसका जवाब पुलिस जांच, न्यायिक प्रक्रिया और सामने आने वाले तथ्यों के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
(नोट: समाचार में वर्णित कॉल रिकॉर्डिंग, राजनीतिक रंजिश, दबाव एवं अन्य आरोप संबंधित व्यक्तियों द्वारा लगाए गए दावों अथवा क्षेत्र में प्रचलित चर्चाओं पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।)