सभ्य समाज पर तमाचा है श्रीनगर की बेटी सृष्टि कंडारी की हत्या। सचिवालय में काम करने वाले पति पर गंभीर आरोप।
आख़िर एक बेटी के सपनों की उम्र ही कितनी होती है? बचपन से पढ़ाई, संघर्ष, परिवार का भरोसा, अपने पैरों पर खड़ा होने का सपना और फिर एक दिन शादी के बाद नई ज़िंदगी की शुरुआत। लेकिन क्या किसी ने सोचा था कि श्रीनगर गढ़वाल की होनहार बेटी सृष्टि कंडारी की नई ज़िंदगी महज़ आठ महीनों में ही इस तरह खत्म हो जाएगी?
सृष्टि सिर्फ़ एक नाम नहीं थीं। वह एक सरकारी विद्यालय की अध्यापिका थीं, सैकड़ों बच्चों के भविष्य को संवारने वाली शिक्षिका, अपने माता-पिता का अभिमान और उन बेटियों के लिए प्रेरणा थीं जो अपने दम पर आगे बढ़ना चाहती हैं। जिसने दूसरों को जीवन की राह दिखाई, आज उसी की ज़िंदगी सवालों के घेरे में खत्म हो गई।
उनकी संदिग्ध मौत ने पूरे उत्तराखंड, विशेषकर श्रीनगर गढ़वाल को भीतर तक झकझोर दिया है। इस मामले में उनके पति, जो सचिवालय में निजी सचिव के पद पर कार्यरत बताए जा रहे हैं, पर हत्या का आरोप लगा है। देहरादून में मुकदमा दर्ज हो चुका है और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।
यह किसी एक परिवार का दर्द नहीं है। यह हर उस पिता की बेचैनी है जो अपनी बेटी को विदा करते समय कहता है। बेटा, अब वही तुम्हारा घर है। यह हर उस मां की टूटती हुई उम्मीद है जिसने अपनी बेटी को मुस्कुराते हुए विदा किया था। और यह हर उस बेटी का डर है, जो अपने सपनों के साथ एक नए घर में कदम रखती है।
आज ज़रूरत सिर्फ़ शोक जताने की नहीं, बल्कि सच सामने आने की है। जांच निष्पक्ष हो, तेज़ हो और बिना किसी दबाव के हो। यदि सृष्टि के साथ अन्याय हुआ है, तो दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे कानून के कठघरे तक पहुंचना ही चाहिए।
सृष्टि अब लौटकर नहीं आएंगी। लेकिन अगर उनकी मौत भी समाज को नहीं जगा पाई, तो शायद हम बेटियों की सुरक्षा पर सिर्फ़ भाषण ही देते रह जाएंगे। सृष्टि कंडारी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें और उनके परिजनों को यह असहनीय दुख सहने की शक्ति प्रदान करें। अब पूरा उत्तराखंड सिर्फ़ एक बात चाहता है।
सृष्टि को न्याय।