देवास। देवास शहर के प्राचीन राजघराने के राजबाड़े में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आज भी करीब 120 वर्ष पुरानी परंपराओं के साथ मनाया जाता है। पीढ़ियां बदल गईं, समय बदला, लेकिन राजघराने की यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और गरिमा के साथ निभाई जा रही है।
बताया जाता है कि पहले राजबाड़े में सात दिनों तक श्रीकृष्ण का पहरा लगता था, जिसे समय के साथ घटाकर तीन दिन कर दिया गया। खास बात यह है कि देवास राजघराने की छठी पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। राजघराने के महाराज विक्रमसिंह पवार स्वयं पहरे में खड़े होकर इस परंपरा का निर्वहन करते हैं।
पहरे के दौरान अलग-अलग समय पर भजन मंडलियां पारंपरिक धोती-कुर्ते की वेशभूषा में नजर आती हैं। भजनों और पारंपरिक वातावरण के बीच राजवाड़े में कृष्ण जन्माष्टमी की प्राचीन संस्कृति जीवंत होती दिखाई देती है।
कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण को परंपरागत पालखी में विराजमान कर शहर में दिंडी यात्रा यात्रा निकाली जाती है। इस यात्रा को देखने और इसमें शामिल होने के लिए शहरवासियों में खासा उत्साह रहता है। अगले दिन मटकी फोड़ कार्यक्रम के साथ विभिन्न महाराष्ट्रीयन पारंपरिक खेलों का आयोजन भी आकर्षण का केंद्र रहता है।
देवास की इस अनूठी परंपरा और राजघराने से जुड़े आयोजन को लेकर देवास विधायक गायत्रीराजे पवार से भी खास चर्चा की गई, जिसमें उन्होंने इस ऐतिहासिक परंपरा के महत्व और इसे आगे बढ़ाने को लेकर अपनी बात रखी।
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