राहुल के राजनीतिक विरोधाभासों और तर्कों का चक्रव्यूह।
Rahul Gandhi के राजनीतिक तर्कशास्त्र और 'तस्वीर' का रहस्य।
भारतीय राजनीति में राहुल गांधी के तर्कों की क्रोनोलॉजी भी बड़ी अद्भुत चीज है। जब सुविधा हो, तब पुलिस महकमा सीधा गृह मंत्री Amit Shah के इशारे पर काम कर रहा होता है, चाहे बात संसद के बाहर हंगामा करने की हो या पैलेट गन का हिसाब मांगने की। उस वक्त गृह मंत्री की 'कमांड' इतनी अटूट मानी जाती है कि मानो हर सिपाही की जेब में वॉकी-टॉकी सीधा नॉर्थ ब्लॉक से जुड़ा हो।
लेकिन जैसे ही राहुल किसी थाने की चौखट पर कदम रखते हैं, अचानक उनका सारा प्रशासनिक ढांचा बदल जाता है, वहां पहुंचते ही सवाल उठने लगता है "यह विभाग अमित शाह के अधीन है ? अमित शाह यह विभाग चलाते है ? तो दीवार पर उनकी तस्वीर क्यों लगी है?"
अब इस क्रांतिकारी तर्क की गहराई को समझिए,
यह राहुल का नया प्रशासनिक नियम है, अगर कोई मंत्री अपने विभाग का प्रमुख है, तो उसकी फोटो ऑफिस में नहीं होनी चाहिए।
तस्वीर को लेकर राहुल का नया मानक, ऑफिस में फोटो सिर्फ उसी की लगनी चाहिए जिसका उस विभाग से दूर-दूर तक कोई लेना-देना न हो, या जो दशकों पहले दुनिया को अलविदा कह चुका हो!
यदि इस अनोखी लॉजिक-थ्योरी को देश भर में लागू कर दिया जाए, तो फिर हर सरकारी दफ्तर से नेहरू जी, इंदिरा जी और राजीव जी की तस्वीरें सबसे पहले सम्मानपूर्वक हटानी पड़ेंगी। क्योंकि अगर "विभाग चलाने वाला फोटो में नहीं आ सकता", तो जो वर्षों पहले जा चुके हैं और अब कोई ऑफिस नहीं चला रहे, उनकी उपस्थिति तो इस नए सिद्धांत के हिसाब से पूरी तरह 'अवैध' हो जाएगी!
राजनीति में जब दोहरा मापदंड हो और तर्कों का अकाल पड़ता है, तो ऐसे ही self-goal देखने को मिलते हैं। जनता सब देख रही है और समझ भी रही है कि जब विरोध के लिए कोई ठोस मुद्दा नहीं बचता, तो फिर दीवारों पर टंगी तस्वीरें ही सबसे बड़ा निशाना बन जाती हैं।
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