कानाफूसी... 🤫
नगर पालिका के नवनिर्वाचित अध्यक्ष और उपाध्यक्ष जब पहली बार दफ्तर पहुंचे थे, तब दोनों की कुर्सियां अध्यक्ष महोदय के चैंबर में ही सजी थीं। शहर भर में चर्चा थी कि यह नई कार्यसंस्कृति है या राजनीतिक प्रेम का नया अध्याय!
अब खबर उड़ रही है कि दोनों कुर्सियों का "सौहार्दपूर्ण बंटवारा" हो गया है। उपाध्यक्ष जी की कुर्सी अपने निर्धारित चैंबर में पहुंच चुकी है। आखिर ऐसा क्या हुआ? इस सवाल का जवाब तलाशने में चौक-चौराहों, चाय की दुकानों और व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के शोधार्थी जुटे हुए हैं।
कोई इसे प्रशासनिक व्यवस्था बता रहा है, कोई राजनीतिक दूरी, तो कोई इसे लोकतंत्र में "सोशल डिस्टेंसिंग" का बेहतरीन उदाहरण मान रहा है।
खैर, कुर्सियां साथ रहें या अलग-अलग, शहरवासियों की बस इतनी सी इच्छा है कि काम की फाइलें कुर्सियों से ज्यादा तेजी से चलें। क्योंकि जनता को कुर्सियों की दूरी नहीं, सुविधाओं की नजदीकी चाहिए!
बाकी, कानाफूसी जारी है...! 😉