शांति भंग के नाम पर पुलिस की मनमानी पर हाई कोर्ट का बड़ा प्रहार
अवैध हिरासत पर ₹25,000 प्रतिदिन मुआवजा, दोषी अधिकारियों की सैलरी से होगी वसूली
कैलाश चंद एडवोकेट ने बताया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसमें पुलिस और प्रशासन द्वारा "शांति भंग" की आशंका के नाम पर की जाने वाली मनमानी कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी की गई है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना जेल भेजना या अनावश्यक रूप से हिरासत में रखना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
मामला गाजियाबाद निवासी अधिवक्ता चंदर पाल सिंह का था, जिन्हें फरवरी 2026 में शांति भंग की आशंका के आधार पर हिरासत में लिया गया था। आरोप था कि बांड भरने के बावजूद उन्हें रिहा नहीं किया गया और जेल भेज दिया गया। मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि संबंधित अधिकारियों ने कानून का पालन नहीं किया, जिसके चलते अदालत ने पीड़ित को ₹75,000 मुआवजा देने का आदेश दिया।
कैलाश चंद एडवोकेट ने बताया कि यह फैसला आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि कई बार पुलिस शांति भंग की आशंका का हवाला देकर लोगों को हिरासत में ले लेती है, जबकि कानून इसके लिए स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित करता है। यदि उस प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता, तो यह नागरिकों की स्वतंत्रता पर सीधा आघात है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए की जाने वाली निवारक कार्रवाई में सामान्य परिस्थितियों में केवल व्यक्तिगत बांड (पर्सनल बॉन्ड) लिया जाना चाहिए। बांड की राशि ₹20,000 से अधिक नहीं होनी चाहिए तथा सामान्यतः किसी जमानतदार (श्योरिटी) की मांग नहीं की जानी चाहिए।
कैलाश चंद एडवोकेट ने बताया कि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि व्यक्ति बांड भर देता है तो उसे उसी दिन तत्काल रिहा किया जाना चाहिए। केवल बांड भरने के बाद भी किसी व्यक्ति को जेल भेजना कानून की भावना के विपरीत है।
फैसले में यह भी कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति बांड भरने से इनकार करता है, तो उसके इनकार की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग करना आवश्यक होगा। इसके बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी, ताकि भविष्य में किसी प्रकार के विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो।
सबसे महत्वपूर्ण निर्देश यह है कि यदि किसी नागरिक को बिना किसी वैध कारण के 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखा जाता है, तो राज्य सरकार को उसे ₹25,000 प्रतिदिन की दर से मुआवजा देना होगा। बाद में यह राशि दोषी अधिकारी की सैलरी से वसूल की जाएगी और उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी की जाएगी।
कैलाश चंद एडवोकेट ने बताया कि हाई कोर्ट का यह निर्णय पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करने वाला एक ऐतिहासिक फैसला है। इससे न केवल नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा होगी, बल्कि कानून का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों पर भी अंकुश लगेगा।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को शांति भंग की आशंका के नाम पर हिरासत में लिया जाता है, तो उसे यह जानने का अधिकार है कि उससे कितना बांड मांगा जा सकता है, उसे कब रिहा किया जाना चाहिए और कानून उसके अधिकारों की किस प्रकार रक्षा करता है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला भविष्य में निवारक हिरासत और शांति भंग संबंधी मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित होगा तथा नागरिक स्वतंत्रता को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर माना जाएगा।
Rewari, Rewari | Jun 13, 2026