आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी?
एक तरफ वर्दी थी, दूसरी तरफ किताबें। एक तरफ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभा रही पुलिस, तो दूसरी तरफ अपने भविष्य, शिक्षा और रोजगार से जुड़े सवालों को लेकर सड़क पर उतरे छात्र। दोनों इसी देश के नागरिक हैं, दोनों का उद्देश्य देश की सेवा ही है। फिर आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी थी कि दोनों को एक-दूसरे के सामने खड़ा होना पड़ा?
लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन कोई अपराध नहीं, बल्कि नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। उसी तरह कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का कर्तव्य है। समस्या तब पैदा होती है, जब संवाद की जगह टकराव ले लेता है। जब बातचीत के दरवाजे बंद हो जाते हैं, तब सड़कें संघर्ष का मैदान बन जाती हैं।
आज जो तस्वीरें सामने आईं, वे केवल छात्रों और पुलिस की नहीं थीं। वे उस व्यवस्था का आईना थीं, जिसमें समाधान की जगह टकराव दिखाई दिया। चोट चाहे छात्र को लगे या पुलिसकर्मी को, दर्द दोनों तरफ होता है। आखिर दोनों के घरों में भी परिवार उनका इंतजार करता है। दोनों इसी मिट्टी के बेटे-बेटियां हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि कौन सही था और कौन गलत। असली सवाल यह है कि क्या यह स्थिति टाली जा सकती थी? क्या समय रहते संवाद नहीं हो सकता था? क्या छात्रों की बात सुनने का कोई ऐसा मंच नहीं था, जहां उन्हें सड़क पर उतरने की जरूरत ही न पड़ती? और क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ तनाव कम करने के और रास्ते नहीं खोजे जा सकते थे?
लोकतंत्र की असली ताकत डंडे या भीड़ में नहीं, बल्कि संवाद में होती है। जब सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर युवाओं की आवाज सुनते हैं, तभी विश्वास मजबूत होता है। अगर संवाद कमजोर पड़ जाए, तो टकराव बढ़ना तय है।
आज जरूरत किसी एक पक्ष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि उन कारणों को समझने की है जिन्होंने यह स्थिति पैदा की। क्योंकि हार किसी छात्र की नहीं होती, हार किसी पुलिसकर्मी की भी नहीं होती—हार उस व्यवस्था की होती है जो अपने ही लोगों को आमने-सामने खड़ा होने से नहीं रोक पाती।
सवाल आज भी वही है आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि एक ही देश के दो जिम्मेदार वर्ग आमने-सामने खड़े हो गए? इस सवाल का जवाब केवल सरकार, प्रशासन या छात्रों को ही नहीं, पूरे समाज को मिलकर तलाशना होगा। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी जीत संवाद में है, संघर्ष में नहीं।
Baraut, Bagpat | Jul 20, 2026