"भाई, यह आम का पेड़ कब तक बनेगा?" — हसन का सवाल और हाशिम की खामोशी
राजगढ़ के ऐतिहासिक कोठीबाग में आम के पौधे को थामे खड़े 3 साल के मासूम हसन ने अपने 9 साल के बड़े भाई हाशिम से पूछा— "भाई, यह पेड़ कब तक बनेगा"
इस सवाल पर हाशिम के पास कोई जवाब नहीं था, बस एक शांत खामोशी थी। दरअसल, हाशिम (कक्षा 3) और हसन (नर्सरी) दोनों राजेश्वर कॉन्वेंट स्कूल के छात्र हैं। हाशिम पिछले कई दिनों से मुझसे कह रहे थे कि उनकी शिक्षिका ने उन्हें पौधा लगाने का प्रोजेक्ट दिया है। काम की व्यस्तता के कारण मैं बात को टालता रहा। लेकिन 27 जुलाई को जब मैं हसन के साथ हाशिम को लेने स्कूल पहुँचा, तो हाशिम ने फिर याद दिलाया— "पापा, आज पौधा लगाना है, आपने इस बारे में किसी से बात की?"हाशिम की उत्सुकता देखकर मैंने हामी भर दी और हम तीनों कोठीबाग की तरफ चल दिए।
राजगढ़ का कोठीबाग वह मशहूर स्थान है जहाँ के आमों के पेड़ की नीलामी हर साल होती है और ये अपने ख़ास स्वाद के लिए जाने जाते हैं। इस समय कोठीबाग की देखरेख कृषि विज्ञान केंद्र के प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. लाल सिंह संभाल रहे हैं। हमने उनसे चर्चा की, तो उन्होंने सहर्ष आम का पौधा और स्थान उपलब्ध कराया। वहाँ हाशिम, हसन और मैंने मिलकर पौधारोपण किया और उसके संरक्षण की पूरी जिम्मेदारी ली।
पौधारोपण के बाद जब हसन के सवाल पर हाशिम खामोश रह गए, तब डॉ. लाल सिंह ने आगे बढ़कर हसन को मुस्कुराते हुए जवाब दिया— "बेटा, जैसे-जैसे तुम बड़े होगे, वैसे-वैसे आम का यह पौधा भी बड़ा होगा।"
डॉ. लाल सिंह की यह बात सिर्फ एक बच्चे की जिज्ञासा का समाधान नहीं थी, बल्कि इसमें एक गहरा संदेश छिपा था। जिस तरह हम अपने बच्चों का लालन-पालन करते हैं, बिल्कुल उसी तरह हमें इन पौधों को भी अपनी औलाद की तरह सींचना और सहेजना होगा। अगर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित देखना चाहते हैं, तो हमें पौधों को सिर्फ रोपने तक सीमित न रहकर उनके बड़े होने तक की जिम्मेदारी उठानी होगी।
28 जुलाई यानी 'विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस' (World Nature Conservation Day) हमें इसी जिम्मेदारी का अहसास कराता है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान और घटते जलस्तर की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब प्रकृति का संरक्षण केवल भाषणों या फोटो खिंचवाने तक सीमित नहीं रह सकता। इसे हमारी रोजमर्रा की आदत और जीवनशैली का हिस्सा बनना होगा।
हाशिम और हसन की इस मासूम पहल ने मुझे एक पर्यावरण पत्रकार के नाते भी यह सोचने पर मजबूर किया कि बच्चों में बचपन से ही प्रकृति के प्रति यह संवेदनशीलता जगाना कितना ज़रूरी है। कोठीबाग में रोपा गया यह पौधा सिर्फ हाशिम के स्कूल का एक प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि हमारे परिवार का प्रकृति से बंधा एक अटूट संकल्प है। जैसे-जैसे हाशिम और हसन बड़े होंगे, यह पौधा भी एक छायादार और फलदार वृक्ष बनेगा—इस बात का प्रतीक बनकर कि यदि हम प्रकृति को संवारेंगे, तो प्रकृति भी हमारे बच्चों के भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बनाएगी।
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— अब्दुल वसीम अंसारी