अभी दिल्ली में एक वूमेन मार्च चल रहा है।
वहां लड़कियां नारे लगा रही हैं—
“एक कचौड़ी, दो समोसा … इन मर्दों का क्या भरोसा।”
इसी बीच मेरी बेटी का फोन आया।
मेरी बेटी ने अभी-अभी दिल्ली यूनिवर्सिटी में फर्स्ट ईयर में एडमिशन लिया है।
उसने कहा—
“पापा, आज वहां एक मार्च चल रहा था… मैं भी देखने चली गई थी।”
मैंने पूछा—
“क्या देखा?”
बेटी बोली—
“पापा… बहुत सारी लड़कियां थीं।
सब पढ़ने के लिए दिल्ली आई हैं।
किसी के पापा फीस भर रहे हैं,
किसी के पापा किराया भेज रहे हैं,
किसी के पापा अपनी जरूरतें रोककर बेटियों को पढ़ा रहे हैं।”
फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने कहा—
“लेकिन पापा… वहीं कुछ लड़कियां नारा लगा रही थीं—
‘इन मर्दों का क्या भरोसा।’”
उसकी बात सुनकर मैं भी कुछ देर चुप रहा।
क्योंकि सवाल सिर्फ उस नारे का नहीं है।
सवाल ये है कि जिस समाज में बेटियां पढ़ रही हैं,
उसी समाज में बेटों और बेटियों के बीच भरोसा कैसे बने?
हर पुरुष गलत नहीं होता…
और हर महिला सही नहीं होती।
गलती की पहचान इंसान के लिंग से नहीं,
उसके व्यवहार से होनी चाहिए।
तुम्हें पढ़ाने का मकसद सिर्फ डिग्री दिलाना नहीं है।
मेरा सपना है कि तुम इतनी समझदार बनो
कि किसी के नारे से नहीं,
अपने अनुभव और अपनी सोच से फैसला करो।
क्योंकि समाज लड़ाई से नहीं,
एक-दूसरे के सम्मान और भरोसे से आगे बढ़ता है।
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Hisar, Hissar | Sep 30, 2026