➡️ ऊँची पहाड़ियों एवं पथरीली बंजर भूमि को हरित बनाना समय की आवश्यकता
वर्तमान समय में पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, भूजल स्तर में गिरावट तथा भूमि क्षरण जैसी समस्याएँ दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही हैं। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई तथा प्राकृतिक वन क्षेत्रों में कमी के कारण वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है और ऑक्सीजन की उपलब्धता घटती जा रही है। परिणामस्वरूप तापमान में वृद्धि, सूखा, बाढ़, वर्षा का असंतुलित वितरण तथा कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार एक विकसित वृक्ष प्रतिवर्ष लगभग 100 से 120 किलोग्राम ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ता है तथा बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण कर पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मध्य प्रदेश तथा बुंदेलखंड क्षेत्र में बड़ी मात्रा में ऊँची पहाड़ियाँ, पथरीली भूमि एवं बंजर ढालें उपलब्ध हैं। इन क्षेत्रों में होने वाली वर्षा का अधिकांश जल बहकर नालों, नदियों और अंततः समुद्र तक पहुँच जाता है। इसके साथ उपजाऊ मिट्टी का भी कटाव होता है, जिससे भूमि की उत्पादकता कम होती जाती है। यदि इन बंजर पहाड़ियों पर जल संरक्षण संरचनाओं के साथ उपयुक्त वृक्षों एवं झाड़ियों का रोपण किया जाए तो न केवल भूमि का संरक्षण होगा बल्कि पर्यावरण सुधार, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण तथा ग्रामीण आजीविका को भी बढ़ावा मिलेगा।
ऐसे क्षेत्रों में खेजड़ी (Prosopis cineraria), करंज (Pongamia pinnata), देशी बबूल (Vachellia nilotica), कुमठा या गोंद बबूल (Acacia senegal), कैर या करील (Capparis decidua), सीताफल (Annona squamosa), बेर (Ziziphus mauritiana), अगावे (Agave sisalana), नागफनी (Opuntia ficus-indica) तथा थोर (Euphorbia caducifolia) जैसी प्रजातियाँ अत्यंत उपयुक्त पाई गई हैं।
खेजड़ी, जिसे शमी एवं जांटी के नाम से भी जाना जाता है, अत्यधिक सूखा सहनशील वृक्ष है तथा इसकी सांगरी फलियाँ आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होती हैं। करंज भूमि में नाइट्रोजन स्थिरीकरण कर उर्वरता बढ़ाता है तथा इसके बीजों से तेल प्राप्त होता है। कुमठा से उच्च गुणवत्ता का गोंद प्राप्त होता है जबकि कैर एक कांटेदार झाड़ी है जो बकरियों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है तथा इसके फल अचार निर्माण में उपयोग किए जाते हैं। सीताफल एवं बेर पथरीली भूमि में सफल फलदार प्रजातियाँ हैं। वहीं अगावे, नागफनी एवं थोर मिट्टी कटाव रोकने, जीवित बाड़ बनाने तथा अत्यंत कम पानी में जीवित रहने के लिए प्रसिद्ध हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए कंटूर आधारित अर्धचंद्राकार संरचनाएँ अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती हैं। इन संरचनाओं को ढाल की समान ऊँचाई अर्थात कंटूर रेखा पर बनाया जाता है। सामान्यतः इनका व्यास 1 से 1.5 मीटर तथा गहराई 20 से 30 सेंटीमीटर रखी जाती है। अर्धचंद्राकार संरचना का खुला भाग पहाड़ी के ऊपरी हिस्से की ओर रखा जाता है ताकि वर्षा का बहता हुआ पानी उसमें एकत्र होकर धीरे-धीरे भूमि में समा सके। अधिक ढाल वाले क्षेत्रों में 45 से 60 सेंटीमीटर चौड़ी तथा 30 से 45 सेंटीमीटर गहरी कंटूर ट्रेंच भी बनाई जा सकती हैं। इन संरचनाओं से जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण तथा पौधों की जीवित रहने की संभावना में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।
पौधारोपण के लिए जून से अगस्त के मध्य प्रथम अच्छी वर्षा के बाद 45 × 45 × 45 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे तैयार किए जाने चाहिए। अत्यधिक पथरीली भूमि में 60 × 60 × 60 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे अधिक उपयुक्त रहते हैं। प्रत्येक गड्ढे में 5 से 10 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर खाद मिलाई जानी चाहिए तथा 45 से 90 सेंटीमीटर ऊँचाई के स्वस्थ पौधों का रोपण करना चाहिए। जहाँ पौधे उपलब्ध न हों वहाँ सीधे बीजों की बुवाई भी की जा सकती है। खेजड़ी, करंज, बबूल, कुमठा, कैर तथा बेर के दो से तीन बीज तथा सीताफल के तीन से चार बीज प्रति गड्ढा डाले जा सकते हैं। अंकुरण के बाद सबसे स्वस्थ पौधे को सुरक्षित रखते हुए अन्य पौधों को निकालकर दूसरे स्थानों पर प्रतिरोपित किया जा सकता है। भविष्य में परिपक्व वृक्षों से प्राप्त बीजों का उपयोग नए क्षेत्रों में वृक्षारोपण के लिए भी किया जा सकता है। जहां पर गधों में वृक्ष लगाया जा रहा हूं वहां पर उपरोक्त प्रजातियों के दो दो तीन-तीन बी भी लगा देना चाहिए जिससे वह सरवाइव कर जाए तो उनमें से एक या दो को छोड़कर के बाकी को निकाल देना चाहिए। यह तकनीकी उन स्थानो के लिए उपयुक्त है जहां ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों पर बकरियां आदि से पौधे से बचाव हो जाए और जहां पर सिंचाई सुविधा ना हो तथा केवल वर्षा ऋतु पर आधारित हरा-भरा पहाड़ी बनाना हो।
व्यावहारिक रूप से मिश्रित वृक्षारोपण मॉडल अधिक सफल पाया गया है। इसके अंतर्गत लगभग 40 प्रतिशत खेजड़ी, 20 प्रतिशत करंज, 15 प्रतिशत बबूल, 10 प्रतिशत कुमठा, 5 प्रतिशत कैर, 5 प्रतिशत सीताफल तथा 5 प्रतिशत बेर का रोपण किया जा सकता है। ढालों, मेड़ों एवं कटावग्रस्त भागों पर अगावे, नागफनी तथा थोर का रोपण विशेष रूप से लाभकारी रहता है।
यदि ग्राम पंचायतें, वन समितियाँ, स्वयंसेवी संस्थाएँ, किसान समूह तथा स्थानीय समुदाय मिलकर इस प्रकार के वृक्षारोपण एवं जल संरक्षण अभियान चलाएँ तो आने वाले वर्षों में पहाड़ियाँ पुनः हरी-भरी हो सकती हैं। इससे पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, भूमि सुधार, जैव विविधता संवर्धन, पशुओं के लिए चारा उपलब्धता, ग्रामीण रोजगार सृजन तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी। वास्तव में ऊँची पहाड़ियों एवं पथरीली बंजर भूमि को हरित बनाना केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के सुरक्षित एवं समृद्ध भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण निवेश है।
डॉ. के. एस. यादव, प्रमुख वैज्ञानिक एवं प्रमुख
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय।
कृषि विज्ञान केंद्र, सागर (म.प्र.)
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Sagar, Madhya Pradesh | Jun 6, 2026