#मंदिर
भगवान भी खुश
चढ़ावा देने वाले भी खुश
लोगों की और आस्था बढ़ेगी
हमारा पैसा पुन्य के काम आ रहा है
*मंदिर का चढ़ावा, बेटियों का सहारा: पूरे देश में लागू हो ये व्यवस्था*
भगवान को सोने चाँदी की भूख नहीं है। भगवान को भक्त के आँसू और भूखे के पेट की चिंता है। जब राम मंदिर में चढ़ावा 80 प्रतिशत गिर जाता है तो समझ लो कि भक्त का भरोसा टूट रहा है। चोरी की खबरें, हिसाब का न मिलना, और पैसे का गलत इस्तेमाल आस्था को खोखला कर रहा है।
*समस्या साफ है*
आज देश के बड़े मंदिरों में रोज़ करोड़ों का चढ़ावा आता है। तिजोरी भरती है मगर सवाल वही रहता है कि ये पैसा जाता कहाँ है? भक्त दान करता है पुण्य के लिए, पर जब उसे लगता है कि उसका पैसा भगवान तक नहीं पहुँच रहा तो वो हाथ खींच लेता है। अयोध्या की ताज़ा खबर इसी का सबूत है।
*समाधान भी साफ है*
हर मंदिर ट्रस्ट कानून बनाकर तय करे कि कुल चढ़ावे का 40 प्रतिशत हिस्सा सीधे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों की शादी पर खर्च होगा। न दहेज, न दिखावा। सिर्फ ज़रूरी खर्च: कपड़े, गहने की न्यूनतम व्यवस्था, बारात का भोजन, और कन्यादान। एक शादी का बजट 2 लाख तय कर दो।
*हिसाब किताब*
अगर एक बड़ा मंदिर साल में 100 करोड़ चढ़ावा लेता है तो 40 करोड़ रुपये से 2000 बेटियों की शादी हो सकती है। पूरे देश में 50 बड़े मंदिर ये करें तो साल की 1 लाख शादियाँ। सोचो कितने परिवार कर्ज से बचेंगे। कितनी बेटियों की आँख का पानी रुकेगा। बचा हुआ 60 प्रतिशत पैसा अस्पताल, स्कूल और अन्न क्षेत्र में लगे।
*मिसाल पहले से मौजूद है*
तिरुपति बालाजी ट्रस्ट 'कल्याणमस्तु' के तहत हज़ारों गरीब बेटियों की सामूहिक शादी करवाता है। शिरडी साईं संस्थान हर साल सैकड़ों परिवारों का बोझ उठाता है। वैष्णो देवी बोर्ड भी यही काम करता है। जब ये कर सकते हैं तो बाकी क्यों नहीं?
*कैसे लागू हो*
1. *केंद्रीय कानून*: सभी बड़े मंदिर ट्रस्टों के लिए अनिवार्य हो कि चढ़ावे का 40% बेटियों की शादी और 30% शिक्षा-स्वास्थ्य पर खर्च होगा।
2. *पब्लिक ऑडिट*: हर महीने वेबसाइट पर डालो कि कितना चढ़ावा आया, कितनी शादियाँ हुईं, किस परिवार को लाभ मिला। नाम, गाँव, फोटो सब सार्वजनिक।
3. *जिला कमेटी*: DM की निगरानी में लिस्ट बने। सिर्फ BPL परिवार, वो भी जिनकी सालाना आय 1 लाख से कम हो। दलाल और सिफारिश बैन।
*फायदा किसे*
फायदा सीधा गरीब को होगा। फायदा मंदिर को होगा क्योंकि भक्त देखेगा कि उसका 10 रुपये का सिक्का किसी बेटी की डोली उठा रहा है। चढ़ावा 80 प्रतिशत गिरने की जगह 200 प्रतिशत बढ़ेगा। आस्था और भरोसा दोनों लौटेंगे।
मंदिर तिजोरी भरने के लिए नहीं, दिल जोड़ने के लिए होते हैं। जब भगवान के घर से बेटी हँसकर विदा होगी तब मानेंगे कि वाकई राम राज्य आया है। इसलिए ये व्यवस्था आज नहीं तो कल, पूरे देश में लागू होनी ही चाहिए।