Public App Logo
Jansamasya
News
पुलिस
Maharashtra
Bjp
National
Police
Bihar
कांग्रेस
Congress
Modi
Delhi
Viral
Up
अमित_शाह
Bollywood
Breakingnews
Narendramodi
Madhya_pradesh
Pmmodi
Rahulgandhi
यूपी
Uttarpradesh
Haryana
Cricket
Lucknow
Uttarakhand
Sambalpur
Crimenews
Karnataka

विदिशा में NEET छात्रा रागिनी विश्वकर्मा और उनके पिता की बेबसी देखकर शायद ही कोई संवेदनशील व्यक्ति अपनी भावनाएं रोक पाए। रागिनी का सपना था डॉक्टर बनने का। महीनों की मेहनत, अनगिनत घंटे की पढ़ाई और परिवार की उम्मीदें लेकर वह परीक्षा देने निकली थी। लेकिन किस्मत ने रास्ते में साथ नहीं दिया। गांव से परीक्षा केंद्र करीब 70 किलोमीटर दूर था। रास्ते में पिता की बाइक पंक्चर हो गई। ऊपर से तेज बारिश शुरू हो गई। हर मिनट कीमती था और समय लगातार फिसलता जा रहा था। आखिरकार पिता-पुत्री परीक्षा केंद्र पहुंचे... लेकिन सिर्फ दो मिनट देर से। और यही दो मिनट रागिनी के पूरे साल पर भारी पड़ गए। नियमों का हवाला देकर उसे परीक्षा कक्ष में प्रवेश नहीं दिया गया। जिस बेटी की मेहनत को बचाने के लिए पिता बारिश, दूरी और मुश्किलों से लड़ता हुआ वहां तक पहुंचा था, उसकी आंखों के सामने उसका सपना टूट गया। बेटी को परीक्षा से वंचित होता देखकर पिता का दर्द फूट पड़ा। वह गेट पर सिर पटकने लगे, जमीन पर बैठकर रोने लगे। एक पिता की वह बेबसी कैमरे में कैद हो गई, जिसे देखकर हर किसी का दिल भर आया। सोचिए, उस वक्त रागिनी क्या कर रही होगी? अपने टूटते सपनों को देख रही होगी या अपने बिखरते पिता को संभाल रही होगी? नियम जरूरी हैं, व्यवस्था भी जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या व्यवस्था में संवेदनशीलता के लिए कोई जगह नहीं बची? क्या दो मिनट की देरी और पूरे साल की मेहनत का मूल्य एक जैसा हो सकता है? यह घटना सिर्फ एक छात्रा की नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर भी सवाल खड़े करती है जिसमें कई बार इंसान पीछे छूट जाता है और नियम आगे निकल जाते हैं। रागिनी की छूटी हुई परीक्षा शायद फिर हो जाए, लेकिन उस दिन पिता-पुत्री ने जो दर्द झेला, उसे वे शायद जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे। #neet #vidisha

Bhiwani, Bhiwani | Jun 22, 2026
विदिशा में NEET छात्रा रागिनी विश्वकर्मा और उनके पिता की बेबसी देखकर शायद ही कोई संवेदनशील व्यक्ति अपनी भावनाएं रोक पाए। रागिनी का सपना था डॉक्टर बनने का। महीनों की मेहनत, अनगिनत घंटे की पढ़ाई और परिवार की उम्मीदें लेकर वह परीक्षा देने निकली थी। लेकिन किस्मत ने रास्ते में साथ नहीं दिया। गांव से परीक्षा केंद्र करीब 70 किलोमीटर दूर था। रास्ते में पिता की बाइक पंक्चर हो गई। ऊपर से तेज बारिश शुरू हो गई। हर मिनट कीमती था और समय लगातार फिसलता जा रहा था। आखिरकार पिता-पुत्री परीक्षा केंद्र पहुंचे... लेकिन सिर्फ दो मिनट देर से। और यही दो मिनट रागिनी के पूरे साल पर भारी पड़ गए। नियमों का हवाला देकर उसे परीक्षा कक्ष में प्रवेश नहीं दिया गया। जिस बेटी की मेहनत को बचाने के लिए पिता बारिश, दूरी और मुश्किलों से लड़ता हुआ वहां तक पहुंचा था, उसकी आंखों के सामने उसका सपना टूट गया। बेटी को परीक्षा से वंचित होता देखकर पिता का दर्द फूट पड़ा। वह गेट पर सिर पटकने लगे, जमीन पर बैठकर रोने लगे। एक पिता की वह बेबसी कैमरे में कैद हो गई, जिसे देखकर हर किसी का दिल भर आया। सोचिए, उस वक्त रागिनी क्या कर रही होगी? अपने टूटते सपनों को देख रही होगी या अपने बिखरते पिता को संभाल रही होगी? नियम जरूरी हैं, व्यवस्था भी जरूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या व्यवस्था में संवेदनशीलता के लिए कोई जगह नहीं बची? क्या दो मिनट की देरी और पूरे साल की मेहनत का मूल्य एक जैसा हो सकता है? यह घटना सिर्फ एक छात्रा की नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर भी सवाल खड़े करती है जिसमें कई बार इंसान पीछे छूट जाता है और नियम आगे निकल जाते हैं। रागिनी की छूटी हुई परीक्षा शायद फिर हो जाए, लेकिन उस दिन पिता-पुत्री ने जो दर्द झेला, उसे वे शायद जिंदगी भर नहीं भूल पाएंगे। #neet #vidisha - Bhiwani News