विश्वगुरु और वर्ल्ड क्लास इकॉनमी के बड़े-बड़े दावे अपनी जगह हैं… लेकिन जमीनी हकीकत देखिए!
आज भी मासूम बच्चों को स्कूल जाने के लिए एक सुरक्षित पुल तक नसीब नहीं है। वर्षों से बच्चे बांस के सहारे बने अस्थायी पुल से तमसा नदी पार करके स्कूल जाते रहे, लेकिन नदी का जलस्तर बढ़ते ही वह सहारा भी खत्म हो गया।
अब सवाल ये है—बच्चे स्कूल जाएं तो जाएं कहाँ से?
लोग वर्षों से मांग कर रहे हैं कोई करोड़ों का बड़ा प्रोजेक्ट नहीं चाहिए… बस इतना सा मजबूत पुल बना दीजिए कि बच्चे पैदल और साइकिल से सुरक्षित स्कूल पहुंच सकें।
क्या बच्चों की पढ़ाई और उनकी जान की कीमत एक छोटे से पुल से भी कम है? आखिर प्रशासन और जनप्रतिनिधि कब जागेंगे?
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