यह घटना आधुनिक समाज की उस कड़वी और दर्दनाक सच्चाई को उजागर करती है, जहाँ पैसे और व्यस्तता की चकाचौंध के आगे खून के रिश्ते पूरी तरह फीके पड़ चुके हैं। कभी मुंबई के बड़े कपड़ा व्यापारी रहे शिवचरण गुप्ता की *मंगलवार* को सोनीपत के वृद्धाश्रम में हुई गुमनाम मौत ने इंसानियत और औलाद के फर्ज को तार-तार कर दिया है। अपनी पूरी जिंदगी मेहनत करके बेटियों को *उच्च शिक्षित* और *शिक्षिका बनाने वाले पिता के अंतिम संस्कार के लिए भी उन बेटियों के पास न समय था और न ही संवेदना। महज *5100* रुपये ऑनलाइन भेजकर पिता के अंतिम संस्कार का 'ऑनलाइन सौदा' करना और वीडियो कॉल पर मुखाग्नि देखने की शर्त रखना, यह दिखाता है कि तकनीक ने भले ही दूरियां कम कर दी हों, लेकिन दिलों के बीच कभी न भरने वाली खाई पैदा कर दी है। यह वाकया सवाल उठाता है कि आखिर संस्कारों की इस बदहाली के आगे आज के दौर में पारिवारिक रिश्तों की क्या अहमियत रह गई है!