#जवाब दो #मामाजी
*"रातें और दिन का हिसाब"*
कहते हैं 25 जून 1975 की रात काली थी।
मान लिया।
पर उसके बाद जो सफेद रातें आईं, उनका क्या?
वो रातें जब पूरा देश ATM की लाइन में खड़ा होकर सुबह का इंतजार करता रहा। सुबह हुई तो पता चला कि जेब में रखा काला धन तो सफेद हो गया, पर अपनी मेहनत की कमाई काली स्याही जैसी हो गई।
फिर आई वो रातें जब ताली-थाली बजाने के बाद घर में बंद हो गए। सड़कें खाली, फैक्ट्री में ताला, और पैदल चलता हिंदुस्तान। कहा गया "जान है तो जहान है", पर जहान चलाने वाले ही सड़क पर बेहाल थे।
अब दिन में भी चैन नहीं। थाली में महंगाई तैर रही है, नौकरी के विज्ञापन में सिर्फ उम्मीद छप रही है, और अन्नदाता अपनी फसल का दाम पूछ-पूछ कर थक गया।
तो साहब, काली रात एक थी, जिसे इतिहास याद रखेगा।
पर ये सफेद रातें रोज आती हैं, जिन्हें जनता भुगत रही है।
फर्क बस इतना है: वो काली रात घोषित थी, ये सफेद रातें अघोषित हैं।