चुनाव से पहले नेताओं ने लंबे-चौड़े वादे किए थे।
आज जनता पूछ रही है— वे वादे कहाँ गए? क्या किए गए वादे पूरे हुए?
सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और विकास के जिन सपनों को दिखाया गया था, क्या वे धरातल पर उतर पाए?
जनता का सवाल सीधा है— वादे सिर्फ चुनाव जीतने के लिए थे या उन्हें निभाने के लिए भी?
अब जवाब देने का समय है, क्योंकि लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी ताकत है। पूछती है जनता… आखिर वादों का हिसाब कब मिलेगा?