
गाँव के एक छोटे से घर में मनोज अपनी बेटी रिया को बहुत प्यार करता था। रिया उसकी इकलौती बेटी थी। बचपन से ही मनोज ने उसे बेटे की तरह पढ़ाया-लिखाया और हमेशा यही कहा—
“बेटी, जिंदगी में अपने फैसले खुद लेना, लेकिन ऐसा कोई फैसला मत करना जिससे अपनों का दिल टूट जाए।”
समय बीता और रिया बड़ी हो गई। उसे एक लड़के से प्यार हो गया। उसने घरवालों को समझाने की कोशिश की, लेकिन मनोज इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था। दोनों के बीच कई दिनों तक बहस होती रही।
एक दिन रिया ने घर छोड़ दिया और अपनी पसंद के लड़के से शादी कर ली।
जब यह खबर मनोज को मिली, तो वह अंदर से पूरी तरह टूट गया। गुस्से और दुख में उसने कहा—
“जिस बेटी को मैंने अपनी जिंदगी समझकर पाला, आज वही मुझे छोड़कर चली गई।”
गाँव में तरह-तरह की बातें होने लगीं। कुछ लोगों ने मनोज को समझाया कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा, लेकिन उस समय उसका दुख इतना गहरा था कि वह किसी की बात सुनने की हालत में नहीं था।
दिन बीतते गए।
एक शाम मनोज अकेला बैठा रिया की बचपन की तस्वीरें देख रहा था। तभी उसे एक पुरानी तस्वीर मिली—जिसमें छोटी रिया उसकी उंगली पकड़कर चल रही थी।
मनोज की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसे याद आया कि रिया जब पहली बार स्कूल गई थी, तो डर के मारे उसका हाथ नहीं छोड़ रही थी। उसने तब भी कहा था—
“पापा, आप मेरा हाथ कभी मत छोड़ना।”
मनोज देर तक उस तस्वीर को देखता रहा।
उसे एहसास हुआ कि गुस्से में इंसान ऐसे फैसले ले सकता है, जिनका दर्द जिंदगी भर रहता है।
उसने रिया को फोन मिलाया।
काफी देर तक फोन बजता रहा।
फिर दूसरी तरफ से आवाज आई—
“हैलो पापा…”
मनोज कुछ बोल नहीं पाया। उसकी आँखों में आँसू थे।
बस इतना कहा—
“बेटी, घर लौट आओ… तुम्हारे बिना ये घर आज भी अधूरा है।”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर रिया रोते हुए बोली—
“पापा, मैं घर जरूर आऊँगी… लेकिन क्या आप मुझे माफ कर पाएँगे?”
मनोज ने कहा—
“बेटी से कोई पिता हमेशा नाराज़ नहीं रह सकता।”
उस दिन दोनों के बीच की दूरी खत्म होने की शुरुआत हुई।
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