कल के बेहतर भविष्य की आस में आज कम पगार में काम करने वाले संविदा कर्मी या इन जैसे हजारों लाखों युवा किस कदर तनाव में है जयपुर में दीपक द्वारा मौ*त क़ो चुनना बताने के लिए काफी है खुद क़ो खत्म करना आसान नहीं होता.. सरकार और सिस्टम पहले बड़ी-बड़ी आशाएं और सपने दिखाते है और फिर एक फैसले में झट से बेरोजगार कर देने का दर्द शायद महसूस कर पाते.. दीपक ने किया वो गलत है, लेकिन शायद वह परिस्थितियों से हार चूका था.. पहले खुद क़ो साबित कर 7 से 8 हज़ार की पगार में संविदाकर्मी बन हार्ड ड्यूटी करना.. बोनस अंको के पुरे ना होने पर हर साल रिनेवल के लिए ठेकेदारों और नेताओं से गुहार लगाना.. गुहार और निवेदन के बाद भी भ्रष्ट सिस्टम में ज़ब बिना पैसों के काम नहीं होना और काम हो भी जाए तो हर दिन खौफ और डर के साए में जीना की सरकार कब कौनसा नियम बदल दे.. ठेकेदार कब उसे हटा दे.. खैर बदलने वाला शायद कुछ नहीं.. अपनी लड़ाई खुद लड़ो.. फ़िर चाहे सामने कोई भी हो.. समय ही तो है बदल जाएगा..
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Churu, Churu | Jun 12, 2026