“जमीन से उगते ही रिश्वत की फसल!”
नौकरी मिली तो लगा था अब सरकारी सेवा करेंगे, लेकिन पटवारी मनीष कुमार मीना ने शायद सरकारी नौकरी को “सरकारी सेवा से घर भरने” का लाइसेंस समझ लिया। किसान की जमीन का बंटवारा और तरमीम करने के बदले ₹20 हजार की मांग, मानो खेत की नाप नहीं, ईमानदारी की बोली लगाई जा रही हो।
10 हजार रुपए लेते रंगे हाथ पकड़े गए तो मनीष कुमार मीना ने रिश्वत की रकम भी ऐसे झाड़ियों में फेंकी, जैसे भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं, कचरे का टुकड़ा हो!
विडंबना देखिए—जिस जमीन की पैमाइश और तरमीम करने की जिम्मेदारी थी, उसी मामले में साहब ने अपनी ईमानदारी की जमीन ही खोद डाली।
सरकारी नौकरी मिली थी जनता की सेवा के लिए, लेकिन मनीष कुमार मीना ने सेवा से पहले “सेवा शुल्क” का रास्ता चुन लिया।
अब एसीबी की कार्रवाई ने बता दिया है कि रिश्वत की फसल चाहे जेब में बोई जाए या झाड़ियों में फेंकी जाए, कानून की नजर से नहीं बच सकती।
कटाक्ष यही है—नौकरी लगते ही जनता की सेवा शुरू नहीं हुई, साहब ने तो लगता है “घर भरने की खेती” शुरू कर दी थी!
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