Public App Logo
Jansamasya
News
Maharashtra
Bjp
National
Police
Bihar
India
Coronavirus
कांग्रेस
मौत
Congress
Modi
Delhi
Viral
Rajasthan
मध्यप्रदेश
Bollywood
Breakingnews
Madhya_pradesh
Pmmodi
Rahulgandhi
Uttarpradesh
Haryana
Uttarakhand
Crimenews
Karnataka
Education
Rss
Firozabad

लोकतंत्र में यदि न्यायपालिका संविधान की प्रहरी है, विधायिका कानून बनाती है और कार्यपालिका शासन चलाती है, तो प्रेस को चौथा स्तंभ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह जनता और सत्ता के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का कार्य करता है। प्रेस की स्वतंत्रता केवल पत्रकारों का अधिकार नहीं, बल्कि नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार का भी विस्तार है। इसलिए जब भी प्रेस की स्वतंत्रता की बात होती है, उसका संबंध सीधे लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़ जाता है। हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अभिन्न अंग है, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि आज मोबाइल और माइक्रोफोन लेकर कोई भी स्वयं को पत्रकार बताने लगता है, जबकि कई मामलों में न प्रशिक्षण होता है, न पेशेवर मानदंडों का पालन और न ही किसी प्रकार की जवाबदेही। अदालत ने सरकार से ऐसा नियामक ढांचा विकसित करने पर विचार करने की बात कही, जो प्रेस की स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित कर सके। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब सूचना का माध्यम पूरी तरह बदल चुका है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने खबरों को तेज़, व्यापक और सुलभ बनाया है। लेकिन इसी बदलाव ने अपुष्ट सूचनाओं, फर्जी खबरों, ट्रोल संस्कृति, ब्लैकमेलिंग और सनसनीखेज सामग्री को भी बढ़ावा दिया है। कई बार कुछ लोगों की गैर-जिम्मेदाराना गतिविधियां पूरे पत्रकारिता जगत की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। लेकिन इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी भी नियामक व्यवस्था का उद्देश्य स्वतंत्र पत्रकारिता को नियंत्रित करना नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका सत्ता से सवाल पूछने, जनहित के मुद्दों को उजागर करने और जनता के अधिकारों की रक्षा करने की है। यदि नियमन के नाम पर ऐसा माहौल बन जाए कि पत्रकार निर्भीक होकर प्रश्न पूछने से डरने लगें, तो इसका नुकसान केवल मीडिया को नहीं, पूरे लोकतंत्र को होगा। इसलिए समाधान प्रतिबंधों में नहीं, बल्कि संतुलन में है। पत्रकारिता के नाम पर ब्लैकमेलिंग, फर्जी पहचान, अफवाह फैलाने और तथ्यों से छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ कानून अपना काम करे। वहीं ईमानदार, निष्पक्ष और जनहित में काम करने वाले पत्रकारों की स्वतंत्रता और सुरक्षा पूरी मजबूती से सुनिश्चित की जाए। इसके साथ ही मीडिया संस्थानों, पत्रकार संगठनों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों को भी आत्मानुशासन, तथ्य-जांच और नैतिक आचरण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। अंततः लोकतंत्र की मजबूती केवल आज़ाद प्रेस से नहीं, बल्कि आज़ाद और जवाबदेह प्रेस से सुनिश्चित होती है। स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। जब दोनों साथ चलते हैं, तभी पत्रकारिता जनता का विश्वास जीतती है और लोकतंत्र वास्तव में मजबूत बनता है।

Baraut, Bagpat | Jul 17, 2026