
100 रुपये लागत, 50 रुपये बिक्री! आखिर कब तक अपनी मेहनत आधे दाम पर बेचने को मजबूर रहेगा किसान?
आलू उत्पादक किसानों की हालत एक बार फिर देश की कृषि व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना को सामने ला रही है। खेत में दिन-रात मेहनत करने वाला किसान आज ऐसी स्थिति में पहुंच गया है कि जिस आलू को उगाने में लगभग 100 रुपये प्रति यूनिट की लागत आती है, वही उसे मजबूरी में लगभग आधे दाम पर बेचना पड़ रहा है। यह केवल घाटा नहीं, बल्कि किसान की मेहनत, पूंजी और भविष्य तीनों पर सीधा हमला है।
किसान खेती करता है, बीज खरीदता है, खाद डालता है, सिंचाई करता है, मजदूरी देता है, दवा का खर्च उठाता है और मौसम का जोखिम भी अकेले झेलता है। फसल तैयार होने तक उसकी पूरी पूंजी खेत में फंसी रहती है। लेकिन जब फसल बेचने की बारी आती है, तब बाजार उसकी लागत तक देने को तैयार नहीं होता। ऐसे में किसान के पास नुकसान में बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
आलू की खेती में आज लागत लगातार बढ़ती जा रही है। प्रमाणित बीज महंगे हो चुके हैं। खाद और कीटनाशकों के दाम हर साल बढ़ रहे हैं। डीजल, बिजली, मजदूरी और सिंचाई का खर्च अलग है। इसके बाद खुदाई, छंटाई, बोरी, परिवहन और भंडारण का खर्च भी किसान को ही उठाना पड़ता है। जब इन सभी खर्चों को जोड़कर वास्तविक लागत निकाली जाती है, तो किसान की जेब पहले ही खाली हो चुकी होती है। यदि इसके बाद भी उसे आधी कीमत मिले, तो वह अगले सीजन की खेती कैसे करेगा?
समस्या केवल बाजार भाव की नहीं है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि उत्पादन बढ़ने पर कीमत गिर जाती है, लेकिन लागत कभी कम नहीं होती। जब किसानों के पास आलू अधिक मात्रा में होता है, तब व्यापारी कम दाम लगाते हैं। किसान के पास भंडारण की सीमित व्यवस्था होती है, बैंक का कर्ज चुकाना होता है और परिवार का खर्च भी चलाना होता है। मजबूरी में वह कम कीमत पर भी फसल बेच देता है।
जो किसान आलू को कोल्ड स्टोरेज में रखता है, उसकी परेशानी भी कम नहीं होती। भंडारण शुल्क, परिवहन, लोडिंग-अनलोडिंग और कई अन्य खर्च जुड़ जाते हैं। यदि बाद में बाजार भाव नहीं बढ़ा, तो किसान को दोहरी मार झेलनी पड़ती है। यही कारण है कि कई किसान मजबूरी में भंडारण कराने की बजाय तुरंत बिक्री कर देते हैं।
खबर के अनुसार पश्चिम बंगाल सरकार ने कोल्ड स्टोरेज में रखे आलू पर किसानों को 200 रुपये प्रति क्विंटल अनुदान देने की घोषणा की है। यदि यह व्यवस्था प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो किसानों को निश्चित रूप से कुछ राहत मिल सकती है। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में भी कोल्ड स्टोरेज संचालकों ने सरकार से 250 रुपये प्रति क्विंटल सहायता देने की मांग की है ताकि किसानों का घाटा कुछ हद तक कम किया जा सके।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हर साल घाटा होने के बाद मुआवजा देना ही समाधान है? क्या ऐसी व्यवस्था नहीं बननी चाहिए कि किसान को उसकी उपज का लाभकारी मूल्य समय पर मिल जाए और उसे राहत पैकेज की जरूरत ही न पड़े?
देश में आलू उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उत्पादन बढ़ने के साथ बाजार प्रबंधन उतना मजबूत नहीं हुआ। प्रसंस्करण उद्योग सीमित हैं। किसान और प्रोसेसिंग कंपनियों के बीच सीधा संपर्क कमजोर है। निर्यात की संभावनाओं का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा। परिणाम यह होता है कि अधिक उत्पादन होने पर कीमतें धराशायी हो जाती हैं और पूरा नुकसान किसान को उठाना पड़ता है।
विडंबना देखिए, जिस आलू को किसान घाटे में बेचता है, वही आलू बाद में चिप्स, फ्रेंच फ्राइज, वेफर्स, स्टार्च और अन्य उत्पाद बनकर कई गुना कीमत पर बाजार में बिकता है। मूल्य संवर्धन का पूरा लाभ उद्योग और व्यापार को मिलता है, जबकि सबसे बड़ा जोखिम उठाने वाला किसान घाटे में रहता है।
यदि किसानों को वास्तव में आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है, तो केवल उत्पादन बढ़ाने की बात पर्याप्त नहीं होगी। उत्पादन के साथ-साथ भंडारण, प्रसंस्करण, निर्यात, मूल्य स्थिरीकरण और बाजार सुधार पर भी समान रूप से काम करना होगा। किसान को केवल फसल उगाने वाला नहीं, बल्कि कृषि उद्यमी बनाने की दिशा में नीतियां बनानी होंगी।
सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें बाजार मूल्य अत्यधिक गिरने की स्थिति में किसानों को मूल्य अंतर की भरपाई (Price Deficiency Payment) मिल सके। साथ ही किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को मजबूत कर सीधे प्रोसेसिंग उद्योगों और बड़े खरीदारों से जोड़ना भी आवश्यक है। इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी और किसानों को बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी।
आलू जैसी नाशवान फसल के लिए कोल्ड स्टोरेज की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उसका किराया भी व्यावहारिक होना चाहिए। छोटे किसानों के लिए भंडारण पर विशेष सब्सिडी दी जानी चाहिए ताकि वे मजबूरी में औने-पौने दाम पर फसल बेचने के लिए विवश न हों।
आज जरूरत इस बात की है कि खेती को केवल उत्पादन तक सीमित न रखा जाए। जब तक किसान को उसकी लागत का उचित मूल्य और लाभ नहीं मिलेगा, तब तक कृषि संकट समाप्त नहीं होगा। हर साल रिकॉर्ड उत्पादन का जश्न मनाने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि रिकॉर्ड उत्पादन करने वाला किसान रिकॉर्ड घाटे में न पहुंचे।
आखिर किसान कब तक लागत से कम दाम पर अपनी फसल बेचता रहेगा? क्या केवल राहत पैकेज ही समाधान है या फिर कृषि बाजार व्यवस्था में बड़े सुधार की जरूरत है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए।
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