
यूपी में कांग्रेस की रणनीति: संगठन विस्तार से सीट बंटवारे तक
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी की रणनीति फिलहाल केवल गठबंधन में अधिक सीटें हासिल करने तक सीमित दिखाई नहीं दे रही, बल्कि प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर संगठनात्मक तैयारी करने की दिशा में भी काम किया जा रहा है। पार्टी नेताओं की ओर से सभी सीटों पर प्रारंभिक तैयारी का दावा इसी व्यापक रणनीति का संकेत है। कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि गठबंधन की स्थिति चाहे जो हो, संगठन को हर विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय रखा जाएगा और चुनावी मैदान में उतरने के लिए पार्टी के पास अपना ढांचा तैयार रहे।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की छह सीटों पर जीत और वोट शेयर में वृद्धि ने कांग्रेस को प्रदेश में अपनी राजनीतिक गतिविधियां बढ़ाने का आधार दिया है। इसी प्रदर्शन को आगे बढ़ाते हुए पार्टी अब विधानसभा स्तर पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश का महत्व केवल राज्य की 403 विधानसभा सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर प्रदेश की भूमिका को देखते हुए पार्टी इसे अपने संगठनात्मक पुनर्निर्माण के प्रमुख राज्यों में रख रही है।
प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम की सक्रियता भी इसी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी संगठन सृजन अभियान के साथ-साथ पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को दोबारा संगठन से जोड़ने पर जोर दे रही है। लंबे समय से पार्टी से दूर रहे या संगठन में अपेक्षित भूमिका नहीं मिलने के कारण नाराज नेताओं से संपर्क कर उनकी घर वापसी कराने की कोशिश की जा रही है। बांदा के पूर्व शहर अध्यक्ष पुष्पेंद्र श्रीवास्तव का दोबारा कांग्रेस में शामिल होना इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है। इससे कांग्रेस का प्रयास स्पष्ट होता है कि वह पुराने संगठनात्मक नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने के साथ स्थानीय स्तर पर नेतृत्व की कमी को भी दूर करना चाहती है।
कांग्रेस की रणनीति में सामाजिक संतुलन भी एक महत्वपूर्ण पक्ष है। प्रदेश प्रभारी के रूप में दलित नेतृत्व को जिम्मेदारी देना पार्टी की व्यापक सामाजिक पहुंच बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व को केवल संगठनात्मक नियुक्तियों तक सीमित न रखते हुए उसे बूथ स्तर के संगठन, स्थानीय नेतृत्व और जनसंपर्क अभियान से जोड़ा जाए।
गठबंधन की राजनीति कांग्रेस की रणनीति का दूसरा बड़ा पहलू है। पार्टी की ओर से INDIA गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने की बात कही गई है, लेकिन समाजवादी पार्टी के साथ सीटों का अंतिम बंटवारा अभी तय नहीं है। कांग्रेस की संभावित सीट दावेदारी के पीछे 2024 के लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन एक आधार हो सकता है। इसके साथ ही 2017 के सपा-कांग्रेस गठबंधन के दौरान जिन विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा था, वहां के प्रदर्शन और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को भी सीट बंटवारे की बातचीत में आधार बनाया जा सकता है।
संभावित रूप से कांग्रेस केवल पिछली सीटों की संख्या के आधार पर समझौता करने के बजाय प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली विधानसभा सीटों पर अपने संगठन, पुराने प्रदर्शन, स्थानीय नेतृत्व और सामाजिक समीकरणों का आकलन कर सकती है। यानी सीट बंटवारे की बातचीत में कांग्रेस की कोशिश उन विधानसभा क्षेत्रों की अतिरिक्त दावेदारी की हो सकती है, जहां पार्टी को लगता है कि उसका संगठन अब पहले की तुलना में अधिक सक्रिय है।
इस पूरी रणनीति को देखा जाए तो कांग्रेस फिलहाल दोहरी तैयारी करती दिखाई दे रही है—एक तरफ गठबंधन के भीतर सम्मानजनक सीट हिस्सेदारी के लिए राजनीतिक आधार तैयार करना और दूसरी तरफ प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों पर अपना संगठन खड़ा रखना। पार्टी के लिए वास्तविक परीक्षा यह होगी कि 2024 के लोकसभा चुनाव से बने माहौल को विधानसभा स्तर के मजबूत संगठन में कितना बदला जा सकता है।
आने वाले महीनों में कांग्रेस के लिए संगठन सृजन, पुराने नेताओं की घर वापसी, बूथ स्तर पर सक्रियता, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सपा के साथ सीट बंटवारा सबसे महत्वपूर्ण विषय रहेंगे। इन सभी मोर्चों पर पार्टी की प्रगति ही यह तय करेगी कि 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपनी राजनीतिक मौजूदगी को किस स्तर तक विस्तार दे पाती है।