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समग्र चेतना

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काकरोच से आस की उम्मीद धोखा है!

डॉ सुयश नारायण मिश्रा
लखनऊ। वो जो खुद नाली में पैदा हुआ, किचन की दरारों में बड़ा हुआ। जो हर दिन सिर्फ जिंदा रहने के लिए युद्ध लड़ता है। जिसके दिखते ही लोग घरों में फिनाइल छोड़ देते हों, चप्पलें उठा लेते हों और पूरे खानदान के सफाए का अभियान चला देते हों। उसी काकरोच से हमने देश के कायाकल्प की उम्मीद बांधी है। 

आज काकरोच हमारी मूर्खता पर हंस रहा होगा। मन ही मन कहता होगा, ‘ऐ इंसान, तू कितना अजीब जीव है! तुझे अपनी पंचायत पर भरोसा नहीं, निगम पर नहीं, विधायक सांसद पर नहीं। तूने नेताओं को आजमाया, पार्टियों को आजमाया, आंदोलनों को आजमाया, क्रांतियों को आजमाया। अब तेरी उम्मीदों की मंजिल मैं हूं? …लेकिन मैं धरती का एक छोटा जीव, न तो मेरी कोई विचारधारा है, न घोषणा पत्र। न मेरे पास सत्ता है, न व्यवस्था बदलने की ताकत। मेरे पास तो बस छह पैर हैं और जान बचाकर भागने की कला और तुम हो कि, करोड़ों लोगों की उम्मीदें मेरी पीठ पर लादना चाहते हो, मैं टूट जाऊंगा इंसान। तुम्हारी उम्मीदों का बोझ मुझसे नहीं उठेगा। क्षमा करना मनुष्य, समस्या तुम्हारी है बलिदान मैं नहीं हो सकता। मुझमे इतनी चेतना नहीं, मैं इस्तीफा देता हूं।…. मान लीजिए अगर ऐसा हुआ तो फिर अगला नंबर किसका आएगा? दीमक का? छिपकली का? मच्छर का? या चीटी और चीटे का? या फिर किसी नए अवतार का क्योंकि हमे त्रेता में राम का इंतज़ार था, द्वापर में कृष्ण का। कलयुग आया तो राजाओं और शासकों से उम्मीदें बंधीं। फिर दो सौ साल तक अंग्रेजों के जाने का इंतज़ार रहा। आज़ादी मिली तो लगा अब सब ठीक हो जाएगा। फिर लोकतंत्र आया, क्रांतियां आईं, आंदोलन आए, नई पार्टियां आईं, नए चेहरे आए। हर बार जनता ने उम्मीद का नया पौधा लगाया और हर बार जड़ों में मट्ठा ही डाला गया।

नतीजा यह है कि आज देश फिर उस मुकाम पर खड़ा है जहाँ इंतज़ार किसी भगवान, नेता या क्रांति का नहीं, बल्कि एक काकरोच का है। वह आएगा और समग्र चेतना लाएगा। हमे लगता है कि देश का कायाकल्प अब संविधान से नहीं, काक्रोच से होगा। इंसानों से तो भरोसा ही उठ गया है। विश्वगुरू वाले मोड में हमे राकेट की तरह उड़ना हैं, लेकिन मुझे लग रहा है कि हम निराशा का विश्व रिकॉर्ड बनाना चाहते हैं। जहां गीता ने कर्म को प्रधान बताया, जहां कबीर ने कहा कि अपने भीतर झांको, जहां विवेकानंद ने युवाओं को स्वयं उठने का संदेश दिया, वहां हम उम्मीद का कटोरा लेकर घूम रहे हैं कि कोई काकरोच आ रहा है सिस्टम बदलने। मूर्खता की भी एक सीमा होती है, लेकिन हम अक्सर उसे पार कर जाते हैं।

ऐसा लगने लगा है मानो देश का कायाकल्प अब संविधान, संस्थाओं, नीतियों, चुनावों या जनभागीदारी से नहीं होगा। वह किसी रहस्यमयी काकरोच के प्रकट होने से होगा, जो आएगा और सारी समस्याओं को चुटकियों में समाप्त कर देगा। इससे ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि काकरोच खुद भी शायद हमसे ज्यादा निराश है। उसे भी इस देश में किसी पर भरोसा नहीं दिखता। यहां हजारों राजनीतिक दल हैं, पक्ष है, विपक्ष है, आंदोलनकारी हैं, समाजसेवी हैं, विचारक हैं, लेकिन काकरोच ने किसी को गद्दा बिछाने का न्योता अब तक नहीं दिया। शायद ये पहला डिजिटल युग का आंदोलन है। घोषणा ऑनलाइन है, समर्थन ऑनलाइन है, क्रांति ऑनलाइन है और नाराजगी भी ऑनलाइन ही है। बस एक चीज ऑफलाइन है वह है समाधान। जिसे खोजने की कोशिश हम बरसो पहले छोड़ चुके हैं।

देश में आक्रोश है, इसमें कोई संदेह नहीं। युवाओं के सवाल वास्तविक हैं। छात्रों की चिंताएं लाजमी हैं। व्यवस्था की खामियां भी वास्तविक हैं। लेकिन हर बार किसी नए प्रतीक में मुक्ति तलाश लेना भी एक राष्ट्रीय आदत बन चुकी है। देश में हजारों राजनीतिक दल हैं। सत्तापक्ष है। विपक्ष है। क्रांतिकारी हैं। समाजवादी हैं। राष्ट्रवादी हैं। उदारवादी हैं। सुधारवादी भी हैं। संत हैं महंत हैं, विचारक हैं, लेकिन जनता का विश्वास इन सबकी भीड़ से निकलकर एक काकरोच की शरण में पहुंच गया है।

कर्म, पुरुषार्थ और आत्मनिर्भरता का संदेश देने वाली धरती पर हम उम्मीद का कटोरा लेकर घूम रहे हैं विडंबना देखिए। जिस देश में लोग अपने वार्ड पार्षद का नाम नहीं जानते, मतदान के दिन पिकनिक पर जाते हैं, मोहल्ले की समस्या पर चुप रहते हैं, वहां वे डिजिटली आंदोलन करके व्यवस्था परिवर्तन के सपने देख रहे हैं। काकरोच से उम्मीद कर रहे हैं। हर समस्या का समाधान किसी नए मसीहा में खोज लेना भी हमारी पुरानी बीमारी है। साल 2011 में भी देश ने एक सपना देखा था। भ्रष्टाचार-मुक्त भारत का सपना। जनलोकपाल का सपना।

लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे। उम्मीदों का ज्वार था। ऐसा लगता था कि बस अब व्यवस्था बदलने ही वाली है। मैं भी उस आंदोलन का हिस्सा रहा, अन्ना नहीं यह आंधी है देश का दूसरा गांधी है ये नारे लगाते लगाते गला बैठ जाया करता था, दिल्ली तक नहीं जा सका तो गोमती किनारे लगे टेंट में आंदोलनकारियों का हिस्सा रहा। मांग थी जनलोकपाल यानी शेर की। मिला क्या लोकपाल यानी बिल्ली वो भी दांत-नाखून नोचकर।

वहीं दिल्ली की कुर्सी हिलाने वाले अन्ना के कंधे पर चढ़कर कई लोग मुख्यमंत्री और राज्यपाल की कुर्सी तक पहुंच गए। पर जिस अन्ना ने रालेगण से निकलकर दिल्ली को झुका दिया था, वो आज फिर रालेगण की उसी पगडंडी पर अकेला खड़ा है। सवाल वहीं है—युवा आखिर कितनी बार मैदान में उतरेगा? हर बार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर शुरू होने वाला आंदोलन सत्ता परिवर्तन पर समाप्त हो जाता है।

इस बार उम्मीद किससे है? उनसे, जिनके पास न कोई स्पष्ट आधार है, न कोई रोडमैप। जिनके सामने खुद समस्याओं का अंबार है, लेकिन समाधान की सुई तक दिखाई नहीं देती। हमे ऐसे आक्रोशित काक्रोच से उम्मीद है। फिर भी मेरी शुभकामनाएं हैं हर उस काकरोच, चींटी, चीटे और मच्छर के लिए, जो सचमुच व्यवस्था परिवर्तन का सपना लेकर मैदान में उतरना चाहता है। कामना है ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे, शक्ति दे, विवेक दे और चेतना दे। नमस्कार।
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