
संवैधानिक संस्थाएं सरकार की नहीं, संविधान और जनता की प्रहरी हैं : अजय गौतम
संस्थाओं की स्वतंत्रता पर सवाल उठे तो जनता न्याय की उम्मीद किससे करे?
पंचकूला। जिला कांग्रेस कमेटी पंचकूला के उपाध्यक्ष अजय गौतम ने संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही को लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी बताते हुए कहा कि भारत का लोकतंत्र केवल सरकारों के चुनाव तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक ताकत उन संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता में है, जो कानून के शासन, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करती हैं।
अजय गौतम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी), संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) सहित अन्य संवैधानिक संस्थाओं का दायित्व किसी राजनीतिक दल या सरकार के प्रति निष्ठा निभाना नहीं, बल्कि संविधान और कानून के अनुसार कार्य करना है।
उन्होंने कहा कि जब किसी संवैधानिक संस्था के निर्णय, निष्पक्षता या स्वतंत्रता को लेकर जनता के बीच गंभीर सवाल उठते हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन सवालों का तथ्यात्मक और पारदर्शी जवाब मिलना चाहिए। किसी संस्था पर राजनीतिक दबाव में काम करने के आरोप लगें तो उनकी निष्पक्ष जांच के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए।
अजय गौतम ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए नियुक्ति, कार्यकाल और पद से हटाने की व्यवस्थाओं को मजबूत बनाया जाना चाहिए। साथ ही संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही के स्पष्ट मापदंड होने चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि जनता का किसी संवैधानिक संस्था से विश्वास कमजोर होता है तो उसे बहाल करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सामूहिक जिम्मेदारी है। हालांकि किसी संस्था के खिलाफ हिंसा या कानून हाथ में लेना उचित नहीं है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, न्यायिक उपाय, सूचना के अधिकार, जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सवाल उठाना और लोकतांत्रिक संवाद इसके संवैधानिक एवं वैध रास्ते हैं।
अजय गौतम ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना उनके निर्णयों और कार्यप्रणाली के आधार पर होनी चाहिए। यदि लगातार गंभीर सवाल उठ रहे हों तो उन्हें दबाने के बजाय तथ्यों के आधार पर सार्वजनिक रूप से जवाब दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है। सरकारें और राजनीतिक दल बदलते रहते हैं, लेकिन संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाएं देश की स्थायी व्यवस्था का आधार हैं।
अजय गौतम ने कहा, “संवैधानिक संस्थाएं किसी सरकार की ढाल नहीं, संविधान की प्रहरी हैं। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि जिन संस्थाओं से उसे निष्पक्ष न्याय और सुरक्षा की उम्मीद है, वही सत्ता के दबाव में काम कर रही हैं, तो यह केवल किसी व्यक्ति या दल का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र में जनता के विश्वास का सवाल बन जाता है।”
उन्होंने संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करने के लिए सर्वदलीय एवं सार्वजनिक विमर्श की मांग की, ताकि संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास और मजबूत हो।