
सिस्टम में जब भी कोई बड़ा 'खेल' होता है, तो गाज हमेशा उसी पर गिरती है जो बेचारा खुद पतली डोरी पर लटका होता है।
तस्वीर में साफ दिख रहा है—एक तरफ कचरे का पहाड़ है, और दूसरी तरफ AI का चमचमाता 'डिजिटल हाईवे'। हमारे देश के चार संविदा कर्मियों ने सोचा होगा कि जब देश 'डिजिटल' हो रहा है, तो सफाई भी क्यों न 'डिजिटल' और 'स्मार्ट' कर दी जाए! झाड़ू उठाने में मेहनत लगती है, सो उन्होंने AI टूल उठाया और अधिकारियों को सीधे "स्वच्छ भारत" का साक्षात दर्शन करा दिया।
क्रोनोलॉजी समझिए साहब:
कचरा फैला रहे: आम जनता और अनदेखी।
फंड पास कर रहे: बड़े-बड़े साहब लोग।
और नौकरी से हाथ धो रहे: चार अदने से कांट्रैक्ट कर्मचारी!
🐟 ये तो छोटी मछलियां हैं साहब!
असली मगरमच्छ तो एयरकंडीशनर कमरों में बैठकर फाइलों पर 'सफाई' का ऐसा AI मॉडल चलाते हैं कि करोड़ों का बजट बिना झाड़ू छुए ही साफ हो जाता है। उन पर न कभी जांच बैठती है, न गाज गिरती है।
साहब लोग इतने सीधे हैं कि उन्हें लगा सचमुच गुरुग्राम की सड़कें रातों-रात स्विट्जरलैंड जैसी चमक गईं! जब तक AI की पोल नहीं खुली, तब तक तो पीठ थपथपाई जा रही होगी।
बलि का बकरा: जैसे ही पोल खुली, हमेशा की तरह 'संविदा कर्मी' हाजिर हैं। परमानेंट साहबों की कुर्सी को आंच न आए, इसलिए इन चार 'स्मार्ट' बाबुओं को तुरंत निपटा दिया गया।
अगर जुगाड़ लगाना ही है, तो बड़े स्तर पर लगाओ साहब! छोटे कर्मचारी बनकर अगर तकनीक का 'गलत इस्तेमाल' करोगे, तो सिर्फ नौकरी जाएगी। बड़े अधिकारी बनकर करोगे, तो शायद प्रमोशन मिल जाए!
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