
खरीफ 2026 में खाद की उपलब्धता: क्या इस बार किसानों को डीएपी और यूरिया के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ेगा?
हर साल खरीफ सीजन शुरू होते ही किसानों की सबसे बड़ी चिंता अच्छी बारिश नहीं, बल्कि समय पर खाद मिलने की होती है। खेत तैयार होते हैं, बुवाई शुरू होती है और उसी समय डीएपी, यूरिया और अन्य उर्वरकों की मांग अचानक बढ़ जाती है। पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों से खाद की कमी, लंबी कतारें, कालाबाजारी और टैगिंग की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे में इस बार भी किसानों के मन में यही सवाल है कि क्या खरीफ 2026 में खाद की पर्याप्त उपलब्धता रहेगी या फिर वही पुरानी समस्या दोहराई जाएगी?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस बार स्थिति पहले की तुलना में बेहतर दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार का दावा है कि खरीफ 2026 के लिए देश में यूरिया, डीएपी, एमओपी, एनपीके और एसएसपी सहित सभी प्रमुख उर्वरकों का पर्याप्त भंडार मौजूद है। यदि ये आंकड़े जमीनी स्तर तक सही तरीके से लागू होते हैं, तो किसानों को खाद की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
खरीफ 2026 के दौरान देश में कुल 382.92 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। केवल जून महीने में लगभग 72.22 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों की आवश्यकता थी, जबकि उपलब्धता 274.22 लाख मीट्रिक टन दर्ज की गई। अब तक लगभग 112.23 लाख मीट्रिक टन उर्वरकों की बिक्री हो चुकी है और करीब 61.99 लाख मीट्रिक टन का स्टॉक अभी भी उपलब्ध बताया जा रहा है। यह संकेत देता है कि देश में फिलहाल उर्वरकों की कमी नहीं है।
यदि यूरिया की बात करें, तो किसानों के लिए यह सबसे अधिक उपयोग होने वाला उर्वरक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में इस समय लगभग 124.43 लाख मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध था। इसमें से लगभग 56.48 लाख मीट्रिक टन किसानों तक पहुंच चुका है, जबकि अभी भी लगभग 68 लाख मीट्रिक टन यूरिया का स्टॉक मौजूद है। यह मात्रा सामान्य परिस्थितियों में किसानों की मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त मानी जा रही है।
डीएपी को लेकर भी इस बार सरकार ने राहत भरी तस्वीर पेश की है। देश में लगभग 31 लाख मीट्रिक टन डीएपी उपलब्ध बताया गया है, जबकि जून महीने की आवश्यकता लगभग 11 लाख मीट्रिक टन थी। यानी मांग की तुलना में लगभग तीन गुना स्टॉक मौजूद है। सरकार का कहना है कि पिछले वर्ष की तुलना में इस बार शुरुआती डीएपी स्टॉक लगभग 11.78 लाख मीट्रिक टन अधिक रखा गया है ताकि अचानक मांग बढ़ने पर भी आपूर्ति प्रभावित न हो।
अन्य उर्वरकों की उपलब्धता भी संतोषजनक बताई जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में लगभग 12.45 लाख मीट्रिक टन एमओपी, 71.98 लाख मीट्रिक टन एनपीके तथा 34.48 लाख मीट्रिक टन एसएसपी उपलब्ध है। यदि इन आंकड़ों के अनुसार सभी राज्यों में समय पर वितरण सुनिश्चित होता है, तो किसानों को खाद की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
इस बार सरकार ने केवल स्टॉक बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि उत्पादन बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया है। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और गैस आपूर्ति की चुनौतियों के बावजूद सरकार ने Empowered Pool Management Committee (EPMC) के माध्यम से अतिरिक्त प्राकृतिक गैस की व्यवस्था की। इससे उर्वरक कारखानों को मिलने वाली गैस की आपूर्ति लगभग 32 MMSCMD से बढ़कर 39.31 MMSCMD हो गई।
गैस आपूर्ति बढ़ने का सीधा असर यूरिया उत्पादन पर पड़ा। पहले जहां प्रतिदिन लगभग 54,500 मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन हो रहा था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 67,000 मीट्रिक टन प्रतिदिन तक पहुंच गया है। इसके अलावा कारखानों को उनकी आवश्यकता का पहले लगभग 62 प्रतिशत गैस उपलब्ध हो रही थी, जिसे बढ़ाकर लगभग 76 प्रतिशत कर दिया गया है। इससे घरेलू उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है।
हालांकि खाद की उपलब्धता अधिक दिखाई देने का एक महत्वपूर्ण कारण मानसून की देरी भी है। जून महीने में कई राज्यों में सामान्य से कम वर्षा हुई, जिसके कारण खरीफ फसलों की बुवाई लगभग 23 प्रतिशत तक कम रही। विशेष रूप से सोयाबीन, कपास और कुछ अन्य फसलों की बुवाई प्रभावित हुई। जब बुवाई कम हुई तो स्वाभाविक रूप से खाद की मांग भी अपेक्षाकृत कम रही, जिससे स्टॉक अधिक दिखाई दे रहा है।
यही वह बिंदु है जिस पर किसानों और सरकार दोनों की नजर बनी हुई है। यदि जुलाई में मानसून सामान्य या तेज गति से सक्रिय होता है और बुवाई अचानक बढ़ जाती है, तो खाद की मांग भी तेजी से बढ़ेगी। ऐसे समय पर वास्तविक परीक्षा सरकार की वितरण व्यवस्था की होगी। केवल गोदामों में स्टॉक होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय पर किसानों तक खाद पहुंचना अधिक महत्वपूर्ण है।
पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि कई बार राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद कुछ जिलों और राज्यों में किसानों को डीएपी और यूरिया के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ा। कई स्थानों पर टैगिंग, कालाबाजारी और निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत वसूलने जैसी शिकायतें भी सामने आईं। इसलिए इस बार केवल स्टॉक बढ़ा देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वितरण प्रणाली को भी पूरी तरह पारदर्शी और प्रभावी बनाना होगा।
यदि वास्तव में देश में पर्याप्त मात्रा में खाद उपलब्ध है, तो किसानों को किसी भी दुकान पर निर्धारित मूल्य से अधिक भुगतान नहीं करना चाहिए। यदि कोई विक्रेता खाद के साथ जबरन अन्य उत्पाद खरीदने की शर्त रखता है या निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत मांगता है, तो संबंधित कृषि विभाग और प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।
किसानों को भी इस समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। आवश्यकतानुसार ही खाद खरीदें, अनावश्यक भंडारण से बचें और केवल अधिकृत विक्रेताओं से ही उर्वरक खरीदें। खरीदते समय हमेशा बिल अवश्य लें ताकि किसी भी शिकायत की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध रहे। यदि कहीं कालाबाजारी, टैगिंग या ओवररेटिंग की शिकायत मिले तो उसकी सूचना संबंधित अधिकारियों को दें।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि कागजों पर उपलब्ध स्टॉक वास्तविक रूप से गांव-गांव तक समय पर पहुंचे। यदि वितरण व्यवस्था सुचारु रही और मानसून सामान्य रहा, तो खरीफ 2026 में किसानों को खाद की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। लेकिन यदि वितरण में कहीं भी लापरवाही हुई, तो पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर संकट पैदा हो सकता है।
फिलहाल सरकारी आंकड़े राहत देने वाले हैं। उत्पादन बढ़ा है, आयात मजबूत हुआ है, गैस आपूर्ति सुधरी है और शुरुआती स्टॉक भी पिछले वर्ष से अधिक रखा गया है। अब देखना यह होगा कि जुलाई और अगस्त में जब खरीफ बुवाई अपने चरम पर होगी, तब यही व्यवस्था कितनी प्रभावी साबित होती है।
किसानों की सबसे बड़ी जरूरत केवल यह है कि खाद समय पर, सही मात्रा में और निर्धारित सरकारी मूल्य पर उपलब्ध हो। यदि यह सुनिश्चित हो जाता है, तो खरीफ 2026 का सीजन किसानों के लिए काफी हद तक राहत भरा साबित हो सकता है।
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