🌾🌱*पंचमहाभूत कृषि*🌱🌾
*पंचमहाभूतों की पांचों तृण मात्राओं का फसल उत्पादन में सफलता से उपयोग कराने वाली कृषि पद्धति @ TCBT
पूरा विषय सुनने के लिए TCBT पाठशाला के निम्न लिंक में जाएं
भाग १
https://youtu.be/mVmdXkXEnDw?si=wiy1FVkfdMjj1jGN
भाग २
https://youtu.be/iNi8d38mXKk?si=cBBI19et7upZFe2e
शुरुआत में मुझसे से जुड़े हुए किसानों ने इस तकनीक का नाम ताराचंद बेलजी तकनीक कर दिया, पर शुरू सेे मैने इस कृषि तकनीक काे पंचमहाभूत कृृषि ही कहा है। इस तकनीक में साधारण न्यूट्रिशन मैनेजमेंट नहीं अपितु फाइव लेयर संरचना का निर्माण होता है।
अग्निहोत्र से निकली सुक्ष्म ऊर्जाएं और वृक्षायुर्वेद के फार्मूले जैसे आसव, अरिष्ट, भस्म रसायन, जैव रसायन और रस रसायन आदि का इसमें उपयोग होता है
मुझे वृक्षायुर्वेद से ही पौधों के त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) के संतुलन का ज्ञान प्राप्त हुआ था जो वस्तुतः पंचमहाभूत संतुलन ही है, इसलिए इसे मै वृक्षायुर्वेद कृषि भी कहता हूं।
पंचमहाभूत—भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर के पहले अक्षरों को मिलाने से 'भगवान' शब्द बनता है, और इन्हीं पाँच महाजीवों ने अपनी तन्मात्राओं से पूरी प्रकृति का निर्माण किया है।
इन महाभूतों की अपनी विशिष्ट तन्मात्राएं और गुण हैं। भूमि की तन्मात्रा 'रूप' है, जिसे आधुनिक विज्ञान अणु (जैसे सोना, चांदी, लोहा, जिंक आदि 108 तत्व) कहता है।
गगन की तन्मात्रा 'रंग' है, क्योंकि आकाश में केवल रंग यात्रा कर सकता है, ध्वनि नहीं; यही कारण है कि आकाशगंगा या सूर्य-शनि पर होने वाले विस्फोट हमें सुनाई नहीं देते। वायु की तन्मात्रा 'गंध' है, जो हवा के माध्यम से यात्रा करती है और जिससे भोजन की पहचान होती है। अग्नि की तन्मात्रा 'स्वर' या तरंग है, जो आहुति डालने पर अणुओं को सूक्ष्म कर तरंगों (वाइब्रेशन) में बदल देती है। वहीं, नीर की तन्मात्रा 'स्पर्श' है, जिसके माध्यम से ऊर्जा स्थानांतरित होती है और पानी में ही सूक्ष्म अवस्था में सभी 108 तत्व रहते हैं जिसे रस कहा जाता है। पानी से बना रस और 108 तत्वों की अयन मिलकर ही रसायन बनाते हैं।
प्रकृति में इन तत्वों की भूमिका और उनके स्वरूप अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। भूमि 'माता तत्व' है जो ठोस काया या ढांचे का निर्माण करती है और आवश्यकता पड़ने पर पोषण (जैसे कैल्शियम, आयरन, जिंक) देती है। गगन 'पिता तत्व' है; यह रिक्त या शून्य होने के वजह से प्राण उत्पन्न करता है, फूल खिलाने और फल के अंदर बीज बनाने की क्षमता विकसित कर देता है। वायु 'प्राण तत्व' है, और मनुष्य प्रतिदिन लगभग 550 किलो प्राण वायु (अक्सीजन) ग्रहण करता है। सुगंधित वायु से सुगंधित जीवों का ऊर्जा चक्र (पारिस्थितिकीय तंत्र) विकसित होती है और सकारात्मक ऊर्जा (पॉजिटिव एनर्जी) का वातावरण बनता है। और समारात्मक जीवों का स्वास्थ और प्रजनन क्षमता बढ़ जाता हैै। इसी प्राचीन ज्ञान सुगंधिम पुष्टिवर्धनम कहता है। सुगंध को TCBT ने सकारात्मक ऊर्जा (पॉजिटिव एनर्जी ) कहता है। जबिक दुर्गंध को नकारात्मक ऊर्जा (निगेटिव एनर्जी) कहता है। दुर्गंध से मच्छर और बीमारियां ही पनपती है।
अग्नि 'स्फूर्ति तत्व' है, जो कोशिकाओं में कंपन उत्पन्न करती है, इससे कंपन वृत्ति से ही मस्तिष्क और कोशिकाएं आपस में संवाद करतीं हैं। नीर 'जीवनी शक्ति' है, इसकी तृणमात्रा स्पर्श रस में उपस्थित अयनों को आपस मेें जोड़कर रसायन बनाकर कार्बन और ग्लूकोज से पूर्ण होकर एक कोशिका बनाती है, जोे क्रमश: विभाजित होकर दो, चार आठ, 16 में विभाजित होकर बहुकोशीय जीव बना लेती है।
ये पंचमहाभूत मानव शरीर में पाँच महत्वपूर्ण कोषों और चक्रों का निर्माण भी करते हैं। भूमि तत्व से 'अन्नमय कोष' (यम प्रक्रिया और मूलाधार चक्र) बनता है, गगन तत्व से 'प्राणमय कोष' (नियम प्रक्रिया और स्वाधिष्ठान चक्र/प्रजनन प्रणाली) का निर्माण होता है। वायु तत्व से 'मनोमय कोष' (आहार प्रक्रिया) बनता है; सुगंध से मन प्रसन्न होता है और खाने की इच्छा जागृत होती है। अग्नि तत्व 'विज्ञानमय कोष' (बुद्धि) का निर्माण करता है, जो कंप्यूटर के बाइनरी (0101) की तरह बुद्धि को तीक्ष्ण कर भौतिक दुनिया का ज्ञान कराता है। नीर तत्व से 'आनंदमय कोष' (प्रत्याहार प्रक्रिया और विशुद्धि चक्र) बनता है, जिसका रस (जैसे शरीर की लार) भोजन पचाता है और आत्मा पीनियल ग्लैंड से जुड़कर परमानंद और आत्मबोध की अनुभूति कराता है।
जब इन पाँचों कोषों से परिपूर्ण सुगंधित और ऊर्जावान अन्न या फल हम ग्रहण करते हैं, तो हमारे शरीर में स्वतः ही ये कोष विकसित हो जाते हैं और प्रतिदिन 14 लाख नई कोशिकाएं प्राकृतिक रूप से बनती हैं।
ऐसे शुद्ध भोजन से नींद की आवश्यकता भी कम हो जाती है; एक योगी मात्र ढाई घंटे में, भोगी पाँच घंटे में और रोगी दस घंटे में अपनी नींद पूरी कर लेता है। पंचमहाभूत कृषि का खाद्यान्न मनुष्य का केवल भौतिक शरीर नहीं बनाता अपितु उक्त पांचों तरह के कोशों का निर्माण करता है। ऐसा मनुष्य संपूर्ण स्वास्थ्य को तो प्राप्त करता ही है अपितु अपना पूर्ण जीवन आनंद से जीता है। ऐसा मनुष्य आसानी से ध्यान की अवस्था में पहुंचकर अपना आत्म दर्शन (परम ज्योति का दर्शन ) कर लेता है।
मिट्टी में पंचमहाभूतोें की पांचों तृणमात्राएं आ जाती हैं तोे ऐसी मिट्टी शुद्ध- सजीव- शक्तिशाली हो जाती है। मिट्टी निरंतर सुगंधिम पुष्टिवर्धनम वाली सौंधी महक आती है।
ऐसी सौंधी मिट्टी को खाने जमीन के अंदर 15 फुट नीचे रहने वाले के केंचुए भी ऊपर आ जाते हैं। TCBT खेती करने वाले बहुत से किसानोें की खेतों में सफेद, पीले, नीले रंग के इंडोजेईक केंचुए (अर्थवर्म) देखने को मिले हैं। प्रति वर्गफुट तीन केंचुए खेती मेें आ जाने पर किसी भी प्रकार के फसल उत्पादन के लिए इस मिट्टी की जुताई, निंदाई, गुड़ाई नहीं करनी पड़ती है। यही पंचमहाभूत कृषि है। यही मूल प्राकृतिक खेती है। यही सतयुग की खेती है। इस खेती की फसलों में किसी भी तरह की बीमारियां नहींं आती । 38 तरह की फसलों में हमें अधिकतम उत्पादन प्राप्त हो चुका है।
अग्निहोत्र प्रक्रिया, खनिज भस्म, आसव, आरिष्ट, जैव रसायन, रस रसायन आदि प्रक्रियाओें से TCBT ने इन तृणमात्राओं कोे फसलों को देकर उन्हें पंचहाभूत पूर्ण बनाता है। इन तृणमात्राओं को भूमि में डालकर भूमि को शक्तिशाली बनाता है।
TCBT में भूमि शुद्ध करने के लिए भूमि उपचार की प्रक्रिया विकसित की गई है। इससेे मिट्टी में दुर्गंध की ऊर्जा समाप्त हो जाती है और मित्र जीवाणुओं की बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
पिछले दो दशकों के लगातार प्रयोग के बाद TCBT ने इन तृणमात्राओं को विकसित करना और इनका उपयोग की प्रक्रिया सीख लिया है।
आप सब भी कृषि क्षेत्र में इन ऊर्जाओं और तृणमात्राओं का उपयोग करके अधिकतम उत्पादन प्राप्त करें।
जब किसान प्रकृति के इन तत्वों को समझने का प्रयास करता है, तो खेती को केवल उत्पादन के नजरिए से नहीं, बल्कि प्रकृति, मिट्टी, पौधे और पर्यावरण के आपसी संतुलन के रूप में देखने की एक अलग दृष्टि विकसित होती है।
🎥 वीडियो पूरा देखें और पंचमहाभूत आधारित कृषि की इस अवधारणा को विस्तार से समझें।
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Jabalpur, Jabalpur | Sep 26, 2026