
समय-समय की बात है: जब सत्ता का सूरज ढला और 'अपने' ही कानून के घेरे में आ गए
राजनीति में कोई भी दिन आखिरी नहीं होता और कोई भी कुर्सी स्थाई नहीं होती। यह पुरानी कहावत मध्य प्रदेश के दतिया में हाल ही में घटित घटनाक्रम पर बिल्कुल सटीक बैठती है। कल तक जो नेता सूबे की राजनीति का केंद्र बिंदु हुआ करता था, जिसके एक इशारे पर पूरी पुलिस मुस्तैद हो जाती थी, आज उसी नेता के समर्थकों को काबू करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। वाक्य ही, इसे कहते हैं—“समय-समय की बात है।”
बारात तैयार थी, पर दूल्हा बदल गया
दतिया विधानसभा उपचुनाव को लेकर सियासी माहौल पूरी तरह गरम था। पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के खेमे में पूरी तैयारी थी। समर्थकों को पूरा भरोसा था कि टिकट तो 'भाई साहब' को ही मिलेगा। लेकिन राजनीति की शतरंज पर कब कौन सी चाल बदल जाए, कोई नहीं जानता। भाजपा केंद्रीय चुनाव समिति ने एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट दिया और आशुतोष तिवारी को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया।
यह फैसला समर्थकों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं था। स्थिति ऐसी हो गई कि बारात पूरी तरह सज-धज कर तैयार खड़ी थी, लेकिन ऐन वक्त पर घोड़े पर बैठने वाले दूल्हे को ही बदल दिया गया।
सड़क पर संग्राम: जब बंधक बना नेशनल हाईवे
टिकट कटने की खबर फैलते ही नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा। आक्रोशित कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने ग्वालियर-झांसी नेशनल हाईवे पर चक्का जाम कर दिया। देखते ही देखते गाड़ियों के पहिए थम गए और पूरी रात आम जनमानस—जिसमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग शामिल थे—सड़क पर परेशान होते रहे।
रात भर का घटनाक्रम:
रात भर जाम: ग्वालियर-झांसी हाईवे पर मीलों लंबा ट्रैफिक जाम लगा रहा।
सुबह 4:00 बजे: पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को समझाने और जाम खोलने की मिन्नतें कीं, लेकिन बात नहीं बनी।
तड़के का एक्शन: जब बातचीत से रास्ता नहीं निकला, तो पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े।
इसके बाद माहौल और बिगड़ गया। प्रदर्शनकारियों की तरफ से पथराव हुआ, गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई, जिसमें कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए। आखिरकार, पुलिस ने सख्ती बरतते हुए लाठीचार्ज किया और घंटों की मशक्कत के बाद जाम खुलवाया।
तख्तापलट का कड़वा सच: जो रक्षक थे, वही आज सामने हैं
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और विचारणीय पहलू पुलिस का रवैया रहा। एक समय था जब नरोत्तम मिश्रा मध्य प्रदेश के गृहमंत्री थे। कानून व्यवस्था की पूरी कमान उनके हाथों में थी और सूबे की पुलिस उनके निर्देशों का पालन करती थी। लेकिन सत्ता बदलते ही और पार्टी का हाथ सिर से हटते ही समीकरण बदल गए।
आज वही पुलिस प्रशासन कानून व्यवस्था को हाथ में लेने वाले नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का 'इलाज' करता नजर आया। पुलिस ने दो टूक शब्दों में यह साफ संदेश दे दिया कि:
कानून सर्वोपरि है: चाहे कोई भी रसूखदार कार्यकर्ता या नेता हो, कानून से ऊपर कोई नहीं है।
सख्त कार्रवाई: शांति भंग करने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ प्रशासन कोई नरमी नहीं बरतेगा।
निष्कर्ष
दतिया का यह घटनाक्रम राजनीति के गलियारों में एक बड़ा सबक है। सत्ता और पद सदा के लिए नहीं होते। आज जो समर्थक अपने नेता के लिए हाईवे जाम कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आम जनता को परेशान करके कोई भी जंग नहीं जीती जा सकती। वहीं, यह घटना नेताओं को भी याद दिलाती है कि वक्त बदलते ही अपनों के तेवर और व्यवस्था के नियम कितनी जल्दी बदल जाते हैं।
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