तखि बजार बजर्या सामान, तखि चूड़ी पैज्यूँ की दुकान..."
यानी बाज़ार में तरह-तरह का सामान और चूड़ियों की दुकानें सजी हैं।
"झुमकी, छुबकी, माला मोल्यूलूँ, गोरी हाथ्यूँ मा चूड़ी पेरोलूँ..."
यानी तुम्हारे लिए झुमके, माला खरीदूँ और हाथों में चूड़ियाँ पहनाऊँगा
"मेरी मिजाजा जवाना, कौशिया देखयूलां धिंगतालो..."
इन पंक्तियों में सिर्फ़ बाज़ार का ज़िक्र नहीं, बल्कि पहाड़ के मेलों की रौनक, लोकजीवन की सादगी और प्रेम की मासूमियत भी बसती है।
झुमकों, चूड़ियों और मेलों के बहाने नेगी दा ने एक ऐसे दौर की तस्वीर उकेरी है, जहाँ रिश्तों में अपनापन था, छोटी-छोटी चीज़ों में खुशियाँ थीं और लोकभाषा में जीवन की मिठास झलकती थी।
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