
ताने-बाने में सिमटी उपेक्षा: विरासत और आधुनिकता के दोराहे पर सिसकता चंदेरी
अपनी विशिष्ट बुनावट, अलौकिक शिल्प और शाही धवलता के लिए वैश्विक पटल पर विख्यात चंदेरी साड़ी सिर्फ एक परिधान नहीं, बल्कि इस ऐतिहासिक नगर की अस्मिता का सबसे अटूट ताना-बाना है। किंतु, जब हम इस पुरातात्विक वैभव से समृद्ध नगर की वर्तमान प्रशासनिक और भौगोलिक विसंगतियों का अवलोकन करते हैं, तो एक कटु सत्य से साक्षात्कार होता है। इतिहास के स्वर्णिम झरोखों और वर्तमान की मर्मांतक उपेक्षा के मध्य आज चंदेरी एक ऐसे चौराहे पर दिग्भ्रमित खड़ा है, जहाँ इसकी नैसर्गिक सुंदरता और नागरिकों के मूलभूत अधिकार, दोनों ही दम तोड़ते प्रतीत हो रहे हैं।
महज पाँच किलोमीटर के परिधि में सिमटे अनगिनत कालजयी स्मारक, बेजोड़ स्थापत्य कला और शक्तिपीठ माँ जागेश्वरी देवी का अलौकिक दरबार इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि प्रकृति और पुरखों ने इस धरा को अनुपम स्वरूप देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पर्यटन के मानचित्र पर वैश्विक आकर्षण का केंद्र बनने की असीम संभावनाएँ रखने के उपरांत भी, चंदेरी आज अपने वजूद और मूलभूत विकास के लिए संघर्षरत है।
चुनावी अनुष्ठान और लोक-लुभावन घोषणाओं का छलावा
चंदेरी के जनमानस की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रत्येक चुनावी अनुष्ठान में यह नगर राजनेताओं के लिए मात्र एक 'राजनैतिक कुरुक्षेत्र' बनकर रह जाता है। मतों की फसल काटने के लिए चुनावी मंचों से विकास के ऐसे दिवास्वप्न और भ्रामक जुमले उछाले जाते हैं, जिन्हें सुनकर प्रतीत होता है कि नगर की नियति रातों-रात परिवर्तित हो जाएगी। सत्ताधीश आते हैं, अपनी विजय का परचम लहराते हैं और फिर व्यवस्था के गलियारों में अंतर्ध्यान हो जाते हैं।
दुर्भाग्य देखिए कि चुनाव की सुगबुगाहट शांत होते ही वे तमाम घोषणाएँ और संकल्प-पत्र केवल कागज़ी पुलिंदे बनकर रह जाते हैं और धरातल पर शेष बचती है तो केवल जनता के हिस्से आई 'कोरी सांत्वना'। आज का चंदेरी इस बात का जीवंत और मौन गवाह है कि कैसे दृढ़ राजनैतिक इच्छाशक्ति का अभाव किसी समृद्ध क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा से पृथक कर सकता है।
ढांचागत बदहाली और प्रशासनिक संवेदनहीनता
यदि यथार्थ की कसौटी पर विकास के मानकों को परखा जाए, तो दृश्य अत्यंत निराशाजनक हैं। किसी भी प्रगतिशील समाज की प्राथमिक आवश्यकता सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवाएँ होती हैं। किंतु चंदेरी का उपहास देखिए कि यहाँ का ५० बिस्तरों का अस्पताल दीर्घकालिक प्रतीक्षा के पश्चात भी आज तक पूर्ण रूप से क्रियाशील नहीं हो सका है। स्वास्थ्य जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय पर ऐसी दीर्घसूत्रता और शिथिलता यह स्पष्ट करती है कि आम जनमानस का जीवन प्रशासनिक फाइलों में कितना मूल्यहीन है।
महानगरीय चकाचौंध के दावों की कलई तब और खुल जाती है, जब समाज के सबसे अंतिम और संवेदनशील स्थल—अर्थात 'मरघट शालाओं' (शमशान घाटों) की दयनीय स्थिति उजागर होती है। जहाँ मानव के अंतिम सफर में भी गरिमा और न्यूनतम आवश्यकताएँ (यथा- शेड, पेयजल और स्वच्छता) सुलभ न हों, वहाँ की नगरीय व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। जर्जर सड़कें, वर्षाकाल में जलजमाव की विभीषिका और नागरिक सुविधाओं का अकाल, चंदेरी के ऐतिहासिक सौंदर्य पर एक ऐसा कलंक है जिसे प्रक्षालित करने का कोई प्रामाणिक प्रयास नहीं हुआ।
विस्मृत चेतना: जनता की मूक विवशता
इस संपूर्ण अव्यवस्था के मध्य सबसे चिंताजनक पहलू आम नागरिकों की लाचारी है। चंदेरी के रहवासी अपनी दैनिक जीविका के संघर्ष और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में इस कदर उलझ चुके हैं कि व्यवस्था की विसंगतियों के विरुद्ध मुखर होना उनके लिए एक दुष्कर चुनौती बन गया है। जनमानस की इस विवशतापूर्ण 'खामोशी' को अक्सर शासन-प्रशासन द्वारा 'मौन सुविकृति' अथवा 'संतोष' मान लिया जाता है, जबकि यथार्थ में यह वह मूक वेदना है जिसके तहत वे सब कुछ सहते हुए भी चुप रहने को अभिशप्त हैं।
कायाकल्प का महा-अभियान: आधुनिक चंदेरी का विज़न
चंदेरी को केवल अतीत के गौरव के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता; इसे आधुनिक नगरीय मापदंडों के अनुरूप ढालना समय की महती आवश्यकता है। नगर के पुनरुद्धार हेतु एक व्यापक कार्ययोजना की आवश्यकता है:
भव्य प्रवेश द्वार एवं प्रकाश व्यवस्था: चंदेरी की सीमाओं में प्रवेश करते ही इसकी ऐतिहासिक भव्यता का आभास कराने वाले उत्कृष्ट व कलात्मक 'स्वागत द्वारों' का निर्माण हो। सुरम्य 'प्राणपुर घाटी' को आधुनिक फसाड लाइटिंग से जगमगाया जाए। मुख्य मार्गों के मध्य सुंदर डिवाइडर निर्मित हों और दोनों ओर 'हाई-मास्ट लैंप लाइट्स' से रात्रि का अंधकार दूर हो।
सुरक्षित एवं स्मार्ट यातायात: नगर को अनियंत्रित यातायात से मुक्ति दिलाने हेतु सुव्यवस्थित 'पार्किंग ज़ोन' चिन्हित किए जाएं। सुरक्षा के दृष्टिकोण से चंदेरी के चप्पे-चप्पे पर उच्च क्षमता के 'सीसीटीवी कैमरे' स्थापित हों, जिससे असामाजिक गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जा सके।
डिजिटल सूचना तंत्र और सुसज्जित चौराहे: नगर के प्रमुख चौराहों का जीर्णोद्धार कर उन्हें सौंदर्यकृत किया जाए। वहाँ विशाल 'एलईडी वॉल स्क्रीन्स' लगाई जाएं, जिन पर पर्यटकों और नागरिकों के लिए चंदेरी के इतिहास, सूचनाओं और दिशा-निर्देशों का सतत प्रसारण होता रहे। साथ ही संपूर्ण नगर में कलात्मक 'सांकेतिक बोर्ड' लगाए जाएं।
व्यवस्थित बाज़ार एवं स्वच्छता: जलजमाव वाले संवेदनशील क्षेत्रों का स्थाई तकनीकी समाधान हो। फल-सब्जी विक्रेताओं तथा हॉकर्स के लिए सर्वसुविधायुक्त 'वेंडिंग ज़ोन' निर्मित कर उन्हें गरिमापूर्ण स्थान दिया जाए। नियमित और वैज्ञानिक पद्धति से साफ-सफाई सुनिश्चित की जाए ताकि गंदगी का समूल नाश हो सके।
प्रशासनिक अधोसंरचना का आधुनिकीकरण: प्रशासनिक कार्यकुशलता को गति देने के लिए एक सर्वसुविधायुक्त 'नूतन तहसील भवन' और 'आधुनिक थाना परिसर' का निर्माण अत्यंत अपरिहार्य है। इसी क्रम में स्थानीय बस स्टैंड का आधुनिकीकरण करते हुए वहाँ प्रतीक्षालय, सुंदर पार्क, बैठक व्यवस्था और बसों के प्रक्षालन (धुलाई) हेतु आधुनिक संसाधनों व परिसरों का विकास किया जाए।
आर्थिक स्वावलंबन, अतिक्रमण-मुक्ति और सामाजिक सरोकार
चंदेरी का सर्वांगीण विकास तब तक अधूरा है, जब तक इसके आर्थिक और सामाजिक स्तंभों को सुदृढ़ न किया जाए:
पलायन का दंश और औद्योगिक क्रांति: चंदेरी और उसके ग्रामीण अंचलों की सबसे बड़ी त्रासदी रोज़गार के अभाव में होने वाला सामूहिक पलायन है। स्थानीय स्तर पर कृषि और बुनकरी आधारित सूक्ष्म व मध्यम उद्योगों की स्थापना अत्यंत आवश्यक है, ताकि युवाओं को अपनी ही माटी पर आजीविका प्राप्त हो सके और उन्हें विस्थापन का दंश न झेलना पड़े।
भू-माफियाओं पर प्रहार: शासकीय और प्रशासनिक विभागों की जो बहुमूल्य भूमियाँ वर्तमान में अवैध अतिक्रमण की चपेट में हैं, उन्हें अविलंब अतिक्रमण-मुक्त कराया जाए। इन भूमियों पर जनहित में 'आधुनिक शॉपिंग मॉल', मल्टीप्लेक्स, पार्क अथवा जन-उपयोगी संपत्तियां विकसित की जाएं।
सुलभ मांगलिक परिसर: निर्धन और मध्यमवर्गीय परिवारों के सामाजिक आयोजनों, विवाह-उत्सवों हेतु शासन स्तर पर एक विशाल और सर्वसुविधायुक्त 'सामुदायिक/मांगलिक भवन' का निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग भी सम्मानपूर्वक अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर सके।
एक स्थाई और प्रामाणिक समाधान की दरकार
चंदेरी केवल प्रस्तरों (पत्थरों) पर उकेरी गई इमारतें या कोई व्यावसायिक मंडी मात्र नहीं है, यह भारत की साझी और बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत का एक अमूल्य रत्न है। यदि हमें इस नगर की ऐतिहासिक अस्मिता को अक्षुण्ण रखना है, तो लोक-लुभावन नारों की सतही राजनीति से ऊपर उठना होगा। कागजी बजट और खोखले आश्वासनों के स्थान पर अब वास्तविक धरातल पर ठोस क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
जब तक स्थानीय नेतृत्व और शासन-प्रशासन चंदेरी को मात्र एक 'चुनावी निर्वाचन क्षेत्र' समझने की संकीर्ण मानसिकता का परित्याग कर, इसे इसकी ऐतिहासिक भव्यता और आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने का दृढ़ संकल्प नहीं लेंगे, तब तक चंदेरी विकास की बाट जोहते हुए यूँ ही सिसकता रहेगा। समय आ गया है कि घोषणाओं के बंद कमरों से बाहर निकलकर, जवाबदेही को धरातल पर अवतरित किया जाए।
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