
इन दिनों खरीफ सीजन में देश के कई राज्यों में डीएपी खाद की कमी की शिकायतें सामने आ रही हैं। कई किसानों को समय पर डीएपी नहीं मिल रही है, जबकि कुछ जगहों पर टैगिंग के नाम पर अतिरिक्त उत्पाद खरीदने का दबाव बनाया जा रहा है। ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया पर कई वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिनमें दावा किया जा रहा है कि किसान घर पर ही मात्र ₹35–40 में डीएपी की एक बोरी तैयार कर सकते हैं। यह दावा सुनने में आकर्षक जरूर लगता है, लेकिन क्या यह वास्तव में वैज्ञानिक रूप से सही है? आइए इसे समझते हैं।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बाजार में मिलने वाली डीएपी (Diammonium Phosphate 18:46:0) एक रासायनिक उर्वरक है, जिसमें लगभग 18% नाइट्रोजन और 46% उपलब्ध (Water Soluble) फास्फोरस होता है। यह एक मानकीकृत (Standardized) उर्वरक है, जिसकी गुणवत्ता और पोषक तत्वों की मात्रा निश्चित होती है। इसलिए गोबर, रॉक फॉस्फेट, जिप्सम और अन्य सामग्री को मिलाकर बिल्कुल उसी गुणवत्ता की डीएपी तैयार नहीं की जा सकती।
हालांकि, यदि किसी किसान के पास पर्याप्त गोबर उपलब्ध है और वह जैविक या एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management) अपनाना चाहता है, तो गोबर, रॉक फॉस्फेट, जिप्सम, पीएसबी (Phosphate Solubilizing Bacteria) और ह्यूमिक एसिड का मिश्रण एक अच्छा जैविक फास्फोरस स्रोत बन सकता है। यह मिश्रण मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करता है, कार्बनिक पदार्थ (Organic Carbon) बढ़ाता है, सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाता है तथा लंबे समय में मिट्टी की उर्वरता सुधारने में मदद करता है। लेकिन इसे डीएपी का प्रत्यक्ष विकल्प (Direct Replacement) कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
वायरल दावे के अनुसार लगभग 800 किलोग्राम गोबर, 350 किलोग्राम रॉक फॉस्फेट, 200 किलोग्राम जिप्सम, 1 किलोग्राम पीएसबी कल्चर और 1 किलोग्राम ह्यूमिक एसिड मिलाकर लगभग 1.3 से 1.5 टन मिश्रण तैयार किया जाता है। यह निश्चित रूप से एक अच्छा जैविक पोषक मिश्रण हो सकता है, लेकिन इसमें उपलब्ध फास्फोरस की मात्रा डीएपी जैसी नहीं होती। रॉक फॉस्फेट का अधिकांश फास्फोरस तुरंत उपलब्ध नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और अम्लीय परिस्थितियों की मदद से उपलब्ध होता है। इसलिए इसकी कार्यक्षमता मिट्टी के pH, नमी, तापमान और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता पर निर्भर करती है।
पीएसबी (Phosphate Solubilizing Bacteria) का काम मिट्टी में पहले से मौजूद अथवा रॉक फॉस्फेट में उपस्थित अविलेय (Insoluble) फास्फोरस को पौधों के लिए उपलब्ध बनाने में सहायता करना है। लेकिन यह प्रक्रिया समय लेती है और हर मिट्टी में समान परिणाम नहीं देती। इसी प्रकार ह्यूमिक एसिड मिट्टी की संरचना सुधारने, जड़ों की वृद्धि बढ़ाने और पोषक तत्वों के अवशोषण में मदद कर सकता है, लेकिन यह स्वयं डीएपी का विकल्प नहीं है।
यदि कोई किसान जैविक खेती कर रहा है या धीरे-धीरे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना चाहता है, तो ऐसा मिश्रण उपयोगी हो सकता है। लेकिन यदि लक्ष्य उच्च उत्पादन वाली धान, गेहूं, मक्का या अन्य फसलों में शुरुआती अवस्था में तुरंत उपलब्ध फास्फोरस देना है, तो केवल इस मिश्रण पर निर्भर रहना कई परिस्थितियों में जोखिमपूर्ण हो सकता है।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि गोबर की गुणवत्ता हर किसान के यहां अलग-अलग होती है। रॉक फॉस्फेट की गुणवत्ता भी अलग-अलग कंपनियों में अलग हो सकती है। पीएसबी कल्चर तभी प्रभावी होता है जब वह जीवित और गुणवत्तापूर्ण हो। इसलिए हर किसान को समान परिणाम मिलेंगे, ऐसा मान लेना उचित नहीं होगा।
यदि आपके क्षेत्र में डीएपी उपलब्ध नहीं है, तो कृषि वैज्ञानिकों द्वारा कई वैकल्पिक उर्वरक भी सुझाए जाते हैं, जैसे एनपीके कॉम्प्लेक्स उर्वरक, एसएसपी (Single Super Phosphate) के साथ यूरिया, या अन्य संतुलित उर्वरक संयोजन। कौन-सा विकल्प सबसे उपयुक्त रहेगा, यह आपकी फसल, मिट्टी परीक्षण और स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिशों पर निर्भर करता है।
यह भी सही है कि किसानों को उर्वरक की कृत्रिम कमी, टैगिंग या कालाबाजारी जैसी समस्याओं का सामना नहीं करना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत वसूली जा रही है या जबरन अन्य उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है, तो इसकी शिकायत संबंधित कृषि विभाग, सहकारी समिति या जिला प्रशासन के पास की जानी चाहिए।
निष्कर्ष यह है कि गोबर, रॉक फॉस्फेट, जिप्सम, पीएसबी और ह्यूमिक एसिड का मिश्रण मिट्टी के लिए लाभकारी जैविक पोषक मिश्रण हो सकता है और लंबे समय में मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद कर सकता है। लेकिन इसे रासायनिक डीएपी का "लाख गुना बेहतर" या "₹40 में तैयार होने वाला डीएपी" कहना वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर उचित नहीं है। किसान भाइयों को किसी भी वायरल दावे पर भरोसा करने से पहले उसके पीछे के वैज्ञानिक तथ्यों को अवश्य समझना चाहिए और अपनी मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट तथा स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही उर्वरक प्रबंधन करना चाहिए।
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