
रक्षक ही जब भक्षक बन जाए, तो किसान न्याय की उम्मीद किससे करे?
देश का किसान आज सिर्फ मौसम, बाजार और लागत से ही नहीं लड़ रहा, बल्कि उस व्यवस्था से भी जूझ रहा है जिसे उसकी मदद के लिए बनाया गया था। जिस कृषि विभाग पर किसानों तक गुणवत्तापूर्ण खाद, बीज और कृषि आदान समय पर और सही कीमत पर पहुंचाने की जिम्मेदारी है, अगर उसी विभाग के अधिकारी जांच के नाम पर वसूली करते हुए पकड़े जाएं, तो यह केवल एक भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि पूरे कृषि तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आज सामने आई खबर में आरोप है कि कुछ कृषि अधिकारी खाद-बीज कंपनियों से जांच का डर दिखाकर अवैध वसूली कर रहे थे और कार्रवाई के दौरान लाखों रुपये नकद बरामद हुए। यदि जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल कुछ व्यक्तियों की गलती नहीं मानी जा सकती। यह उस व्यवस्था की कमजोरी को भी उजागर करता है, जहां जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है और भ्रष्टाचार किसानों तक पहुंचने वाली हर व्यवस्था को प्रभावित करने लगता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस अवैध वसूली का बोझ आखिर कौन उठाता है? क्या कोई कंपनी अपनी जेब से यह पैसा देती है? शायद नहीं। व्यवसाय का सामान्य नियम यही कहता है कि अतिरिक्त लागत अंततः किसी न किसी रूप में उपभोक्ता तक पहुंचती है। कृषि क्षेत्र में इसका सीधा असर किसान पर पड़ सकता है। या तो खाद और बीज महंगे होंगे, या गुणवत्ता से समझौता होगा, या फिर दोनों चीजें एक साथ होंगी। अंत में नुकसान उसी किसान का होगा जो पहले से बढ़ती लागत और घटती आय के बीच संघर्ष कर रहा है।
आज किसान पहले ही डीएपी, यूरिया और अन्य उर्वरकों की कमी, कालाबाजारी और टैगिंग जैसी समस्याओं से परेशान है। कई जगह किसान घंटों लाइन में लगने के बाद भी खाली हाथ लौट रहे हैं। ऐसे समय यदि व्यवस्था के भीतर ही भ्रष्टाचार की खबरें सामने आती हैं, तो किसानों का भरोसा और कमजोर होना स्वाभाविक है।
कृषि विभाग की भूमिका केवल निरीक्षण करना नहीं है, बल्कि किसानों के हितों की रक्षा करना भी है। विभाग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि बाजार में नकली खाद-बीज न बिकें, किसानों को निर्धारित मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद मिलें और नियमों का पालन निष्पक्ष तरीके से हो। यदि निरीक्षण और कार्रवाई पारदर्शी होगी तो ईमानदार व्यापारी भी सुरक्षित रहेंगे और किसान भी।
यह भी जरूरी है कि इस मामले की निष्पक्ष और गहन जांच हो। यदि कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यदि कोई निर्दोष है तो उसे भी न्याय मिलना चाहिए। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले जांच पूरी होना आवश्यक है। लेकिन ऐसे मामलों को दबाने के बजाय पारदर्शिता के साथ सामने लाना और दोषियों को जवाबदेह बनाना ही किसानों का विश्वास वापस जीतने का रास्ता है।
सरकारें किसानों की आय दोगुनी करने, कृषि को लाभकारी बनाने और कृषि सुधारों की बात करती हैं। लेकिन जब जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और अनियमितताएं किसानों का पीछा नहीं छोड़तीं, तब ऐसी घोषणाओं का प्रभाव भी कमजोर पड़ जाता है। कृषि सुधार केवल नई योजनाओं से नहीं होंगे, बल्कि ईमानदार और जवाबदेह व्यवस्था से होंगे।
देश का किसान किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहा। वह केवल इतना चाहता है कि उसे सही समय पर सही गुणवत्ता का खाद और बीज मिले, निर्धारित मूल्य पर मिले और उसके साथ किसी प्रकार का अन्याय न हो। यदि व्यवस्था उसे यही नहीं दे पा रही है, तो सबसे पहले उस व्यवस्था को सुधारने की आवश्यकता है।
आज जरूरत है कि कृषि विभाग, प्रशासन, सरकार और न्याय व्यवस्था मिलकर ऐसा माहौल तैयार करें जहां भ्रष्टाचार की कोई जगह न हो। निरीक्षण का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए। किसान का विश्वास तभी लौटेगा जब उसे यह महसूस होगा कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है और कोई भी व्यक्ति अपने पद का दुरुपयोग करके किसानों के हितों से खिलवाड़ नहीं कर सकता।
कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और किसान उसका आधार। यदि आधार ही लगातार शोषण का शिकार होगा, तो मजबूत कृषि व्यवस्था की कल्पना अधूरी रह जाएगी। इसलिए अब समय केवल कार्रवाई का नहीं, बल्कि व्यवस्था में स्थायी सुधार का है ताकि किसान का पसीना किसी की अवैध कमाई का माध्यम न बने।
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