
भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर "वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय" किए जाने के प्रस्ताव का विरोध अब राजनीतिक स्तर पर भी तेज हो गया है। भोपाल मध्य से विधायक आरिफ मसूद ने सोमवार को राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन सौंपकर विश्वविद्यालय का नाम यथावत रखने की मांग की।
उन्होंने कहा कि 38 वर्ष पुरानी शैक्षणिक संस्था की पहचान समाप्त करना उचित नहीं है। यदि सरकार वाग्देवी भोजपाल के नाम से विश्वविद्यालय स्थापित करना चाहती है तो नए विश्वविद्यालय की स्थापना कर उसका नाम रखा जाए।
ज्ञापन में मसूद ने कहा कि 3 जून 2026 को विश्वविद्यालय की कार्य परिषद ने नाम परिवर्तन के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रस्ताव में महान स्वतंत्रता सेनानी मौलाना बरकतउल्ला भोपाली के योगदान को कमतर आंकते हुए यह लिखा गया कि उनका जीवन विदेश में बीता और भोपाल के निवासी होने के अलावा उनका कोई विशेष योगदान नजर नहीं आता।
राज्यपाल को दिए ज्ञापन में आरिफ मसूद ने मौलाना बरकतउल्ला भोपाली के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि वे जापान में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार से जुड़े रहे। वर्ष 1913 में उन्होंने लाला हरदयाल के साथ गदर पार्टी के संस्थापक सदस्य के रूप में काम किया और उसके समाचार पत्र में देशभक्ति से जुड़े लेख लिखे।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1 दिसंबर 1915 को अफगानिस्तान के काबुल में गठित स्वतंत्र भारत की पहली निर्वासित अंतरिम सरकार में राजा महेंद्र प्रताप सिंह राष्ट्रपति और मौलाना बरकतउल्ला भोपाली प्रधानमंत्री बनाए गए थे। इसके अलावा उन्होंने रूस में लेनिन से मुलाकात कर भारत की आजादी के लिए समर्थन भी मांगा था।
ज्ञापन में दावा किया गया कि मौलाना बरकतउल्ला भोपाली की कब्र अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में स्थित है, जहां उन्हें महान भारतीय राष्ट्रवादी नेता के रूप में सम्मानित किया गया है। उनकी मृत्यु के बाद जर्मनी, रूस, जापान, तुर्की, ईरान और अफगानिस्तान सहित कई देशों में श्रद्धांजलि दी गई थी, जो उनके अंतरराष्ट्रीय सम्मान को दर्शाता है।
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