
खाता विभाजन का रेट कार्ड, आधा अभी, आधा बाद में!
श्रीगंगानगर। सरकारी नौकरी को सेवा का माध्यम माना जाता है, लेकिन कुछ कर्मयोगी इसे "अतिरिक्त आय योजना" समझ बैठते हैं। ताज़ा मामला श्रीगंगानगर के रिडमलसर क्षेत्र का है, जहां राजस्व पटवारी अंकुश कुमार ने खाता विभाजन के सरकारी काम को निजी कमाई का सुनहरा अवसर बना लिया।
कहते हैं कि जमीन का बंटवारा परिवारों में होता है, लेकिन यहां खाता विभाजन से पहले रिश्वत की रकम का विभाजन तय हो गया। पटवारी साहब ने संयुक्त खाते के विभाजन और शुद्धिकरण के बदले एक लाख रुपये की मांग रख दी। शायद उन्हें लगा होगा कि सरकारी फीस बहुत पुरानी व्यवस्था है, अब "प्रीमियम सेवा शुल्क" का दौर चल रहा है।
परिवादी ने जब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को सूचना दी तो एसीबी ने भी पूरी तैयारी कर ली। ट्रैप के दौरान पटवारी साहब ने पहली किश्त के रूप में 50 हजार रुपये स्वीकार कर लिए। रकम में 10 हजार असली और 40 हजार डमी नोट थे। साहब को लगा होगा कि किस्मत चमक रही है, लेकिन अगले ही पल एसीबी की टीम सामने थी और सपना टूट गया।
विडंबना यह है कि जिस कलम से लोगों के जमीन संबंधी विवाद सुलझाने थे, उसी कलम के बदले रिश्वत का हिसाब-किताब शुरू हो गया। अब खाता विभाजन का काम तो बाद में होगा, पहले पटवारी साहब को अपने भविष्य का हिसाब लगाना पड़ेगा।
कहावत है कि लालच बुरी बला है। एक लाख रुपये के लालच में सरकारी नौकरी, प्रतिष्ठा और भविष्य तीनों दांव पर लग गए। अब सरकारी रजिस्टर में खाता विभाजन की जगह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का प्रकरण दर्ज होगा और पटवारी साहब को समझ आएगा कि रिश्वत की पहली किश्त कभी-कभी जेल यात्रा की अग्रिम बुकिंग भी बन जाती है।
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