
भारतीय राजनीति में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो सतह पर चुनावी हार-जीत जैसी दिखाई देती हैं, लेकिन उनकी तह में उतरें तो वे एक बड़े संगठनात्मक संदेश की वाहक बन जाती हैं। हाल के दिनों में भारतीय जनता पार्टी के भीतर और चुनावी मैदान में जो घटनाक्रम सामने आए हैं, उन्हें केवल संयोग मान लेना शायद राजनीति की बिसात को कम समझना होगा।
बिहार के बांकीपुर से निकले नेता नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना, मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव में पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर अपेक्षाकृत कम चर्चित संगठनात्मक कार्यकर्ता आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाना, तथा संगठन में लगातार नए चेहरों को आगे बढ़ाने की नीति—इन घटनाओं को भाजपा के भीतर चल रहे एक व्यापक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है।
दतिया का प्रसंग विशेष रूप से चर्चा में रहा। वर्षों तक क्षेत्र की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे डॉ. नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिया गया और पार्टी ने एक संगठनात्मक कार्यकर्ता पर दांव लगाया। इस निर्णय से स्थानीय स्तर पर असंतोष भी देखने को मिला, किंतु भाजपा नेतृत्व अपने फैसले पर कायम रहा।
यहीं से एक सियासी पैग़ाम उभरता है—भाजपा शायद अपने कार्यकर्ताओं को यह एहसास दिलाना चाहती है कि पार्टी में मुकद्दर केवल बड़े नामों से नहीं लिखा जाएगा। दरवाज़े उस कार्यकर्ता के लिए भी खुले हैं जो वर्षों से चुपचाप संगठन की ईंटें जोड़ता रहा है। सियासत की ज़ुबान में कहें तो यह एक तरह का "इंतज़ामिया संदेश" है कि ताज किसी के सिर पर स्थायी नहीं और सफ़र किसी के लिए बंद नहीं।
बांकीपुर और दतिया जैसे चुनावी नतीजों ने भाजपा को झटका अवश्य दिया, परंतु राजनीति में हर हार केवल पराजय नहीं होती। कई बार हार भी एक संदेश लेकर आती है। दतिया उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी को हार का सामना करना पड़ा और इसके बाद नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देने के निर्णय पर चर्चाएं तेज हुईं।
राजनीति के जानकारों का एक वर्ग मानता है कि भाजपा अब व्यक्तित्व-आधारित राजनीति से अधिक संगठन-आधारित राजनीति की ओर अपने ढांचे को और मज़बूत कर रही है। यह वही सोच है जिसमें कार्यकर्ता को कहा जाता है—"तैयार रहो, कल तुम्हारी बारी भी आ सकती है।" कोई पीछे बैठा कार्यकर्ता आज मंडल में हो, कल विधानसभा में दिखाई दे सकता है। कोई पार्षद आज साधारण कार्यकर्ता हो, तो कल राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी पा सकता है। यह विचार भाजपा की संगठनात्मक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता रहा है।
साहित्य की भाषा में कहें तो "मंज़िल उन्हीं की नहीं होती जो कारवाँ के आगे चलते हैं, कभी-कभी पीछे चलने वाले मुसाफ़िर भी रहनुमा बन जाते हैं।"
हालांकि, इस रणनीति की सफलता या असफलता का अंतिम निर्णय मतदाता ही करता है। चुनावी परिणाम यह भी बताते हैं कि संगठनात्मक संदेश और ज़मीनी जीत, दोनों हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलते। लेकिन इतना अवश्य है कि हाल की घटनाओं ने यह बहस तेज कर दी है कि भाजपा आने वाले चुनावों में व्यक्तियों से अधिक संगठन और कार्यकर्ता-आधारित राजनीति पर भरोसा बढ़ाती दिखाई दे रही है।
सियासत के इस पूरे मंजर में एक बात साफ़ नज़र आती है—भाजपा यह जताने का प्रयास कर रही है कि उसके लिए पद से बड़ा संगठन है, और संगठन से बड़ा कोई व्यक्ति नहीं।
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