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आयुर्वेद को समझने के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा को समझना बेहद जरूरी: कुलपति
- आचार्य चरक ने आयुर्वेद के ज्ञान को व्यवस्थित और व्यापक स्वरूप प्रदान किया: डॉ. संधु
-श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय में मनाई गई महर्षि चरक जयंती
कुरुक्षेत्र। श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के आयुर्वेद संहिता एवं सिद्धांत स्नातकोत्तर विभाग द्वारा महर्षि चरक जयंती श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई गई। कार्यक्रम का शुभारंभ कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान, कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत गुप्ता तथा मुख्यवक्ता प्रो. बलबीर सिंह संधु, आयुर्वेद अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान के प्राचार्य प्रो. आशीष मेहता, विभागाध्यक्ष प्रो. कृष्ण कुमार ने दीप प्रज्ज्वलित करके किया। इस अवसर पर विद्यार्थियों द्वारा सामूहिक रूप से चरक जयंती गायन किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. बलबीर संधु ने कहा कि महर्षि चरक को समझने से पहले आयुर्वेद के अवतरण और उसकी ज्ञान परंपरा को समझना आवश्यक है। आयुर्वेद की परंपरा पौराणिक काल से चली आ रही है और भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल पश्चिमी इतिहास की कसौटियों से नहीं समझा जा सकता।
उन्होंने कहा कि भारतीय वांग्मय में वर्णित परंपराओं, ग्रंथों और पौराणिक प्रमाणों का अध्ययन अपनी दृष्टि से किया जाना चाहिए। अपने इतिहास और ज्ञान परंपरा को समझने के लिए भारतीय स्रोतों को महत्व देना आवश्यक है।
ब्रह्मा से भारद्वाज तक पहुंची ज्ञान की परंपरा: प्रो. संधु
प्रो. संधु ने बताया कि आयुर्वेद का ज्ञान सबसे पहले ब्रह्मा के पास था। ब्रह्मा ने यह ज्ञान दक्ष प्रजापति को, दक्ष प्रजापति ने अश्विनी कुमार को और अश्विनी कुमार से इंद्र ने आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद महर्षि भारद्वाज इस ज्ञान को मृत्युलोक में लेकर आए और पुनर्वसु आत्रेय को प्रदान किया। पुनर्वसु आत्रेय ने अपने छह शिष्यों, अग्निवेश, भेद, जतुकर्ण, पराशर, हारित और शार्पण को आयुर्वेद का ज्ञान दिया। इन शिष्यों ने अपनी-अपनी संहिताओं की रचना की, जिनमें अग्निवेश तंत्र विशेष रूप से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने बताया कि समय के साथ अग्निवेश तंत्र के कई अंश लुप्त हो गए। महर्षि चरक ने इसका पुनर्संस्करण किया और इसे व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। बाद में चरक संहिता के भी कुछ अंश कालांतर में लुप्त हो गए, जिनकी पूर्ति दृढ़बल ने की। इस प्रकार चरक संहिता वर्तमान स्वरूप तक पहुंची।
आयुर्वेद की वर्तमान समृद्ध परंपरा के पीछे हमारे ऋषि-महर्षियों का अमूल्य योगदान: कुलपति
कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि आयुर्वेद की वर्तमान समृद्ध परंपरा और संस्थागत स्वरूप के पीछे हमारे ऋषि-महर्षियों का अमूल्य योगदान है। उन ऋषियों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखकर उसे आत्मसात करें और लोकहित में उसका उपयोग करें। आयुर्वेद के मूल ग्रंथों को सही अर्थों में समझने के लिए शब्दों के सूक्ष्म अंतर को समझना जरूरी है। उन्होंने विद्यार्थियों को आह्वान किया कि वे केवल आधुनिक पुस्तकों तक सीमित न रहें, बल्कि चरक संहिता सहित मूल आयुर्वेदिक संहिताओं का गहन अध्ययन करें, क्योंकि आयुर्वेद की वास्तविक समझ उसके मूल ग्रंथों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़कर ही विकसित हो सकती है। आयुर्वेद को गहराई से समझने के लिए विद्यार्थियों का मूल संहिताओं का अध्ययन करना अत्यंत आवश्यक है। महर्षि चरक ने चिकित्सा विज्ञान को केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के उपचार को आयुर्वेद का मूल उद्देश्य बताया। कुलपति ने कहा कि महर्षि चरक भारतीय चिकित्सा परंपरा के महान आचार्य थे, जिनके विचार आज भी आयुर्वेद के विद्यार्थियों और चिकित्सकों के लिए मार्गदर्शक हैं।
चरक संहिता स्वयं महर्षि चरक के विचारों का स्वरूप: कुलसचिव
कुलसचिव डॉ. कृष्णकांत ने कहा कि महापुरुष और महर्षि किसी एक स्थान या काल तक सीमित नहीं होते। उनके विचार और ज्ञान सदैव समाज का मार्गदर्शन करते हैं। चरक संहिता स्वयं महर्षि चरक के विचारों का स्वरूप है, क्योंकि इसमें उनके चिंतन और मानव कल्याण की भावना समाहित है। महर्षि ब्रह्मलीन होने के बाद भी अपने विचारों और ग्रंथों के माध्यम से समाज में जीवित रहते हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय की आवश्यकता है कि युवा चिंता करने के बजाय चिंतन करें। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य को करने के लिए पहले मन बनाना पड़ता है। जब मन तैयार होता है तो चिंतन और मनन की प्रक्रिया स्वतः आगे बढ़ती है।
आचार्य चरक आयुर्वेद की महान ज्ञान परंपरा के प्रमुख आचार्य थे: डॉ. मेहता
प्राचार्य प्रो. आशीष मेहता ने कहा कि आचार्य चरक आयुर्वेद की महान ज्ञान परंपरा के प्रमुख आचार्य थे और चरक संहिता ने चिकित्सा ज्ञान को व्यवस्थित एवं व्यापक स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद का ज्ञान चरक से बहुत पहले भारतीय समाज में विद्यमान था, लेकिन आचार्य चरक ने उपलब्ध ज्ञान का संकलन, पुनर्संस्करण और सूत्रबद्ध रूप में प्रस्तुतीकरण किया। उन्होंने विद्यार्थियों से आचार्य चरक के जीवन, सिद्धांतों और मूल संहिताओं का गहन अध्ययन कर इस प्राचीन ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
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आयुष विवि में बच्चों का निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर आज से शुरू
कुरुक्षेत्र। श्री कृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वैद्य करतार सिंह धीमान के मार्गदर्शन में कौमारभृत्य विभाग द्वारा आज मंगलवार से 15 दिवसीय निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर आयोजित किया जाएगा। विभाग के प्रोफेसर डॉ. अमित कटारिया ने बताया कि शिविर में आगामी 15 दिनों तक 6 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों का निःशुल्क स्वास्थ्य जांच की जाएगी। बताया कि केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद द्वारा संचालित ‘बाल कास परियोजना’ के अंतर्गत यह शिविर आयोजित किया जा रहा है। जिसका मुख्य उद्देश्य बच्चों में कास (खांसी) एवं श्वसन संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं की पहचान, प्रारंभिक स्वास्थ्य मूल्यांकन तथा स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है। शिविर के दौरान बच्चों के स्वास्थ्य का प्रारंभिक मूल्यांकन करते हुए कास एवं श्वसन संबंधी लक्षणों की जांच की जाएगी तथा परियोजना में निर्धारित पात्रता मानदंडों के अनुसार पात्र बच्चों की पहचान की जाएगी। जिसके बाद बच्चों का मूल्यांकन किया जाएगा। एमएम