
*मुख्यमंत्री जी, आपके राज में यह कैसी न्याय व्यवस्था?*
पत्रकारों के विरुद्ध खबर प्रकाशित करने के बाद सीधे एफआईआर दर्ज की जा रही है। सवाल यह है कि क्या किसी पत्रकार की खबर से कोई व्यक्ति असहमत है तो उसका जवाब तथ्य और कानून के माध्यम से दिया जाएगा या फिर पुलिस की एफआईआर के जरिए उसकी आवाज दबाने की कोशिश होगी?
बिना प्रारंभिक जांच के पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने की शिकायतें गंभीर चिंता का विषय हैं। यदि किसी खबर में तथ्यात्मक गलती है, मानहानि हुई है या कोई संज्ञेय अपराध बनता है तो कानून अपना रास्ता अपनाए, लेकिन पत्रकारिता को अपराध की तरह देखने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि पत्रकारों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने को लेकर सरकार और गृह विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन आखिर क्यों नहीं हो रहा? यदि शासन ने पत्रकारों के मामलों में प्रक्रिया निर्धारित की है तो पुलिस और प्रशासन को उसका पालन करना चाहिए।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी, अब आपको इस मामले में स्वयं संज्ञान लेना चाहिए। पत्रकार वर्षों से पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग कर रहे हैं। यह मांग किसी व्यक्ति विशेष को कानून से ऊपर रखने की नहीं, बल्कि पत्रकारिता करते समय पत्रकारों को अनावश्यक दबाव, प्रताड़ना और झूठे मामलों से बचाने के लिए स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था की है।
पत्रकार सवाल पूछता है, सरकार से जवाब मांगता है और जनता की आवाज सामने रखता है। यदि सवाल पूछने के बाद ही उसके खिलाफ पुलिस कार्रवाई शुरू हो जाए तो फिर लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता कैसे बचेगी?
एफआईआर हो तो कानून के अनुसार, जांच हो तो निष्पक्ष और कार्रवाई हो तो तथ्यों के आधार पर।
मुख्यमंत्री जी, यह केवल किसी एक पत्रकार का सवाल नहीं है। यह प्रदेश में पत्रकारिता की स्वतंत्रता और पत्रकारों के अधिकारों से जुड़ा सवाल है। उम्मीद है कि सरकार इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगेगी और पत्रकारों के विरुद्ध कार्रवाई में तय प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करेगी। सत्ता से सवाल करना अपराध नहीं, लोकतंत्र की जिम्मेदारी है।
Khurai, Sagar | Sep 30, 2026