
बाढ़ पीड़ितों तक राहत सामग्री पहुँचाने की प्रक्रिया देखकर यह साफ हो जाता है कि अफसरों के लिए यह सिर्फ एक औपचारिकता है, जनसेवा नहीं।
प्रशासन अपनी पीठ थपथपा सकता है कि वह काम कर रहा है, लेकिन जरा इस बेपरवाह और थका देने वाले सिस्टम को देखिए:
पहले लाइन में लगकर नाम लिखाओ और आईडी जमा करो। इसके बाद लेखपाल और तहसीलदार के दफ्तरों के चक्कर काटो। लंबी मशक्कत के बाद एक सरकारी पर्ची मिलेगी।
उस पर्ची को लेकर मुख्यालय जाओ और अंत में सामग्री वितरण गाड़ी के पास पहुँचकर राशन लो।
सवाल यह है कि जो इंसान पहले से ही बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है, वह राहत पाने के लिए इन कागजी जंजीरों में उलझा रहे या अपने परिवार को बचाए?
दूसरी तरफ, विडंबना यह है कि जिनके घर पूरी तरह सुरक्षित हैं और जिनकी कर्मचारियों तक सीधी "सेटिंग" है, वे आसानी से दो-दो, चार-चार किट घर ले जा रहे हैं। वहीं, जिन्हें वाकई में इस मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है, वे एक-एक किट के लिए अपनी चप्पलें घिसने को मजबूर हैं।
प्रशासन का यह रवैया संवेदनहीनता की हद है। क्या आपदा के समय भी गरीबों को ही सताना इस सिस्टम की प्राथमिकता रह गई है?
#बाढ़_पीड़ित #राहत_सामग्री #प्रशासनिक_व्यवस्था #उत्तरप्रदेश #संवेदनहीन_सिस्टम