
100 किलो गेहूं उगाने वाला किसान कर्जदार क्यों है, लेकिन उसी गेहूं से दलिया बेचने वाला व्यापारी अमीर कैसे बन जाता है?
यही सवाल आज भारतीय कृषि व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना को सामने रखता है। किसान खेत में मेहनत करता है, जोखिम उठाता है, मौसम की मार झेलता है, पूंजी लगाता है और आखिर में उसे अपनी उपज का ऐसा दाम मिलता है जिससे लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है। दूसरी ओर वही गेहूं जब प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के बाद बाजार में पहुंचता है तो उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है। सवाल यह नहीं कि व्यापारी कमाए क्यों, बल्कि सवाल यह है कि उत्पादन करने वाले किसान को उसकी मेहनत का उचित हिस्सा आखिर क्यों नहीं मिलता?
भारत में खेती की पूरी व्यवस्था आज बाजार पर इतनी निर्भर हो चुकी है कि किसान केवल खेत का मालिक रह गया है, लेकिन खेती का अधिकांश नियंत्रण बाजार के हाथों में चला गया है। पहले किसान अपने बैलों से खेत जोतता था, अपने बीज बचाकर रखता था, गोबर की खाद इस्तेमाल करता था और स्थानीय संसाधनों से खेती चलाता था। आज जुताई के लिए ट्रैक्टर बाजार से खरीदना पड़ता है, उसके लिए बैंक से कर्ज लेना पड़ता है, डीजल बाजार से खरीदना पड़ता है, खराबी आने पर स्पेयर पार्ट्स और मरम्मत भी बाजार से करानी पड़ती है। यानी खेती का पहला कदम ही बाजार पर निर्भर हो गया।
सिंचाई की बात करें तो ट्यूबवेल, मोटर, पाइप, बिजली, डीजल, सोलर सिस्टम, सब कुछ बाजार से आता है। हर साल इनके रखरखाव पर खर्च बढ़ता है। किसान सिंचाई करता जरूर है, लेकिन उसके पीछे खड़ा पूरा तंत्र बाजार का होता है। खेती का दूसरा सबसे बड़ा खर्च भी किसान के नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है।
इसके बाद आती है खाद, बीज और कीटनाशकों की बारी। पहले किसान अपना बीज खुद तैयार करता था। आज हर सीजन नई किस्म खरीदनी पड़ती है। रासायनिक खाद, सूक्ष्म पोषक तत्व, जैव उर्वरक, कीटनाशक, फफूंदनाशक और खरपतवारनाशक सभी बाजार से खरीदने पड़ते हैं। हर साल कीमतें बढ़ती हैं, लेकिन किसान की उपज का मूल्य उसी गति से नहीं बढ़ता। यदि डीएपी की कमी हो जाए तो किसान लाइन में खड़ा होता है। यदि यूरिया की किल्लत हो जाए तो ब्लैक मार्केट का सामना करता है। नुकसान फिर किसान का ही होता है।
जब फसल तैयार हो जाती है तो किसान सोचता है कि अब मेहनत का फल मिलेगा। लेकिन असली संघर्ष यहीं से शुरू होता है। मंडी में पहुंचने के बाद किसान कीमत तय नहीं करता। वहां व्यापारी, आढ़ती, गुणवत्ता जांच, नमी, कटौती और बोली की पूरी प्रक्रिया किसान के पक्ष में नहीं होती। मजबूरी में किसान उसी दिन फसल बेच देता है क्योंकि उसके पास भंडारण की सुविधा नहीं होती, कर्ज चुकाना होता है और अगली फसल की तैयारी करनी होती है। यही कारण है कि किसान अक्सर न्यूनतम मूल्य पर अपनी उपज बेचने को मजबूर हो जाता है।
यहीं से बाजार की दूसरी कहानी शुरू होती है। वही गेहूं व्यापारी खरीदता है। उसे साफ करता है, ग्रेडिंग करता है, प्रोसेसिंग करता है, पैकिंग करता है और फिर दलिया, आटा, सूजी, मैदा या अन्य उत्पाद बनाकर बाजार में बेचता है। 25 से 30 रुपये किलो खरीदा गया गेहूं 60 से 100 रुपये किलो तक बिकने लगता है। प्रोसेसिंग की लागत सीमित होती है, लेकिन मूल्य कई गुना बढ़ जाता है। सबसे बड़ा लाभ मूल्य संवर्धन (Value Addition) से मिलता है, जिसमें किसान की भागीदारी लगभग शून्य रहती है।
यही वजह है कि 100 किलो गेहूं पैदा करने वाला किसान कर्ज में रहता है और उसी गेहूं से दलिया बनाने वाला व्यापारी लाभ कमाता है। किसान केवल कच्चा माल बेचता है जबकि व्यापारी तैयार उत्पाद बेचता है। असली कमाई उत्पादन में नहीं बल्कि प्रोसेसिंग और मार्केटिंग में होती है।
आज किसान की सबसे बड़ी चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है। भारत का किसान उत्पादन करना जानता है। चुनौती यह है कि वह अपनी उपज से अधिक मूल्य कैसे प्राप्त करे। यदि किसान केवल कच्चा माल बेचता रहेगा तो उसकी आय सीमित रहेगी। लेकिन यदि वही किसान समूह बनाकर आटा चक्की, दाल मिल, तेल मिल, पैकिंग यूनिट या प्रसंस्करण इकाई स्थापित करे तो उसकी आय कई गुना बढ़ सकती है।
इसी सोच के तहत किसान उत्पादक संगठन (FPO) की अवधारणा लाई गई। यदि छोटे किसान मिलकर संगठन बनाते हैं तो वे सामूहिक रूप से बीज खरीद सकते हैं, खाद खरीद सकते हैं, मशीनरी साझा कर सकते हैं, गोदाम बना सकते हैं और अपनी उपज सीधे बड़े खरीदारों या उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकते हैं। इससे बिचौलियों की भूमिका कम होगी और किसान का लाभ बढ़ेगा।
एक और महत्वपूर्ण विषय है एमएसपी और एमआरपी का अंतर। एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य केवल सरकारी खरीद का आधार है। यह हर किसान को मिलने वाली गारंटी नहीं है। दूसरी ओर एमआरपी यानी अधिकतम खुदरा मूल्य वह कीमत है जिस पर उपभोक्ता बाजार से उत्पाद खरीदता है। किसान एमएसपी पर बेचता है या उससे भी कम पर बेच देता है, लेकिन वही उत्पाद प्रोसेस होकर एमआरपी पर बिकता है। यही अंतर पूरी मूल्य श्रृंखला में सबसे अधिक लाभ पैदा करता है।
यदि किसान को वास्तव में समृद्ध बनाना है तो केवल एमएसपी बढ़ाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। आवश्यकता है कि किसान को भंडारण, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और सीधी मार्केटिंग से जोड़ा जाए। गांव स्तर पर मिनी प्रोसेसिंग यूनिट, वेयरहाउस, कोल्ड स्टोरेज और किसान उत्पादक संगठन मजबूत किए जाएं ताकि किसान अपनी उपज को तुरंत बेचने के बजाय सही समय पर बेच सके।
आज भी अधिकांश किसान लागत का पूरा हिसाब नहीं रखते। ट्रैक्टर की किस्त, डीजल, मशीन की मरम्मत, मजदूरी, सिंचाई, ब्याज, भूमि का किराया, परिवार की मेहनत-इन सभी को जोड़ने के बाद वास्तविक लागत कहीं अधिक निकलती है। लेकिन बिक्री के समय किसान केवल मंडी में मिलने वाले भाव को देखता है। यही कारण है कि कई बार लाभ का भ्रम होता है जबकि वास्तविकता में किसान घाटे में खेती कर रहा होता है।
कृषि को केवल उत्पादन का व्यवसाय नहीं बल्कि संपूर्ण कृषि उद्यम के रूप में देखने की जरूरत है। खेती तभी लाभकारी बनेगी जब किसान उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग और विपणन में भी भागीदारी करेगा। विकसित देशों में किसान केवल फसल नहीं उगाते बल्कि उसका ब्रांड बनाकर बेचते हैं। भारत में भी धीरे-धीरे यही मॉडल अपनाना होगा।
सरकारों को भी ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनसे गांव स्तर पर कृषि आधारित उद्योग विकसित हों। यदि हर ब्लॉक में किसानों के लिए आधुनिक प्रोसेसिंग सेंटर, वेयरहाउस और मार्केटिंग प्लेटफॉर्म तैयार किए जाएं तो लाखों किसानों की आय में वास्तविक वृद्धि संभव है। केवल उत्पादन बढ़ाने की योजनाएं अब पर्याप्त नहीं हैं। उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक की पूरी मूल्य श्रृंखला में किसान की हिस्सेदारी बढ़ानी होगी।
किसानों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। अकेले खेती करने के बजाय समूह आधारित खेती, एफपीओ, सहकारी मॉडल और स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों की ओर बढ़ना होगा। जब तक किसान केवल कच्चा माल बेचता रहेगा, तब तक सबसे बड़ा लाभ बाजार उठाता रहेगा। लेकिन जिस दिन किसान अपनी उपज का मूल्य संवर्धन शुरू कर देगा, उसी दिन उसकी आर्थिक स्थिति बदलनी शुरू हो जाएगी।
आखिर में सवाल वही है जो हर किसान को खुद से पूछना चाहिए-क्या हम केवल गेहूं उगाने तक सीमित रहेंगे, या गेहूं से बनने वाले उत्पादों के बाजार में भी अपनी हिस्सेदारी बनाएंगे? क्योंकि खेती की असली कमाई खेत से मंडी तक नहीं, बल्कि मंडी से बाजार तक की यात्रा में छिपी हुई है। जिस दिन किसान इस पूरी आर्थिक श्रृंखला का हिस्सा बन जाएगा, उसी दिन खेती वास्तव में लाभ का व्यवसाय बन सकती है।
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