गुरु जी कहिन...
"चंदा और दानपात्र का खेल नया नहीं है... बस फर्क इतना है कि कहीं यह आस्था के नाम पर चलता है,तो कहीं व्यवस्था की आड़ में। पैसा देने वालों की श्रद्धा पर सवाल नहीं, लेकिन उस धन के उपयोग की पारदर्शिता पर सवाल जरूर होना चाहिए।"
आज समाज में धार्मिक,सामाजिक और संस्थागत आयोजनों के नाम पर चंदा जुटाने की परंपरा पुरानी है। लोग विश्वास के साथ सहयोग करते हैं,लेकिन जब वही सहयोग हिसाब-किताब से दूर हो जाता है तो शक की गुंजाइश पैदा होती है। दानपात्र में गिरने वाला हर सिक्का किसी की श्रद्धा, मेहनत और भावना से जुड़ा होता है, इसलिए उसका सही उपयोग होना चाहिए।
"गुरु जी कहिन... घोटाला सिर्फ वहीं नहीं होता जहां शोर मचता है, कई बार वह वहीं छिपा रहता है जहां सवाल पूछने की हिम्मत कम होती है। जरूरत है कि हर चंदे और दान की व्यवस्था में पारदर्शिता हो, ताकि आस्था पर भरोसा बना रहे।"
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