
द्वापर से कलयुग तक: अब स्वयं जागने का समय है
द्वापर युग में जब अधर्म, अन्याय और अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना के लिए पांडवों का साथ दिया। उन्होंने स्वयं शस्त्र नहीं उठाया, बल्कि अर्जुन के सारथी बनकर उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दिया। उन्होंने सिखाया कि जब धर्म और अधर्म का संघर्ष हो, तब मोह, भय और रिश्तों की सीमाओं से ऊपर उठकर सत्य और न्याय का साथ देना ही मनुष्य का परम कर्तव्य है।
श्रीकृष्ण का संदेश केवल युद्ध तक सीमित नहीं था, बल्कि जीवन का शाश्वत सिद्धांत था—जहाँ अन्याय हो, वहाँ मौन रहना भी अन्याय का साथ देना है।
आज हम कलयुग में हैं। आज भगवान श्रीकृष्ण सारथी बनकर हमारे रथ की लगाम थामने नहीं आएंगे। आज हमें स्वयं अपने विवेक को सारथी बनाना होगा। हमें सत्य, साहस, धैर्य और संविधान पर विश्वास रखते हुए अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना होगा।
किन्तु यह भी उतना ही आवश्यक है कि संघर्ष का मार्ग कानून और संविधान की मर्यादा के भीतर हो। क्रोध में आकर कानून अपने हाथ में लेना समाधान नहीं है। एक सभ्य समाज की पहचान यही है कि अपराधी को न्यायालय और न्याय व्यवस्था के माध्यम से उसके अपराध का दंड मिले।
यदि समाज का प्रत्येक जागरूक नागरिक अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाए, सच्चाई का साथ दे, साक्ष्यों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करे और अपराधियों को कानून के कटघरे तक पहुंचाने का संकल्प ले, तो यही सच्ची धर्म रक्षा होगी।
आज आवश्यकता किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों की है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समझें, भय और लालच से मुक्त होकर सत्य का साथ दें तथा न्याय व्यवस्था पर विश्वास बनाए रखें।
याद रखिए— द्वापर में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जगाया था,
कलयुग में हमें स्वयं अपने भीतर के अर्जुन को जगाना होगा।
धर्म की विजय केवल रणभूमि में नहीं होती, बल्कि सत्य, साहस, संयम और न्याय के मार्ग पर अडिग रहकर भी होती है। आइए, संकल्प लें कि अन्याय का विरोध करेंगे, लेकिन कानून का सम्मान करते हुए। यही एक सशक्त, सुरक्षित और न्यायपूर्ण भारत की पहचान है।