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ट्विशा शर्मा प्रकरण ने एक बार फिर दहेज प्रथा और उससे जुड़ी सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं पर बहस छेड़ दी है। भोपाल की 31 वर्षीय ट्विशा शर्मा की विवाह के छह महीने बाद संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। मायके पक्ष ने इसे दहेज हत्या बताया, जबकि ससुराल पक्ष का दावा है कि वह मानसिक तनाव से जूझ रही थीं। सच्चाई अदालत के फैसले के बाद सामने आएगी, लेकिन यह घटना उस सामाजिक बुराई की याद दिलाती है जो आज भी हजारों महिलाओं की जान ले रही है। भारत में दहेज प्रथा को रोकने के लिए 1961 में दहेज निषेध अधिनियम लागू किया गया था। इसके तहत दहेज लेना, देना या मांगना अपराध माना गया है। बाद में कानून को और सख्त किया गया तथा दहेज मृत्यु और प्रताड़ना से संबंधित प्रावधान जोड़े गए। इसके बावजूद दहेज से जुड़ी घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एमसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर वर्ष हजारों महिलाएं दहेज से जुड़ी हिंसा और उत्पीड़न का शिकार होती हैं। कई मामलों में दोष सिद्ध नहीं हो पाता और मुकदमे वर्षों तक अदालतों में लंबित दहेज कानून एक नजर में 1961 : दहेज निषेध अधिनिय मदहेज मांगना अपराध दहेज मृत्यु पर कठोर सजा विवाह के 7 वर्ष के भीतर संदिग्ध मौत पर विशेष रहते

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