
"कुर्सियों की जंग में उलझे नेता, शिक्षा और स्वास्थ्य को किसके भरोसे छोड़ दिया गया डलहौज़ी?"
भलेई कॉलेज पर संकट, स्कूलों के विलय से भविष्य पर प्रश्नचिह्न, सिविल अस्पताल डलहौज़ी से वरिष्ठ चिकित्सकों के तबादले पर सन्नाटा—लेकिन पूरी राजनीतिक ताकत बीडीसी और ज़िला परिषद की कुर्सियां जीतने में लगी : मनीष सरीन
सामाजिक कार्यकर्ता एवं वर्ष 2022 के डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र से पूर्व विधानसभा प्रत्याशी मनीष सरीन ने डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भाजपा और कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व पर तीखा राजनीतिक हमला बोलते हुए कहा कि क्षेत्र के लोगों को अब यह समझ आ गया है कि उनकी प्राथमिकताएं और नेताओं की प्राथमिकताएं बिल्कुल अलग हैं।
सरीन ने कहा कि एक ओर प्रदेश सरकार की युक्तिकरण (रैशनलाइजेशन) नीति के चलते अनेक विद्यालयों के विलय को लेकर अभिभावकों और ग्रामीणों में लगातार चिंता बनी हुई है। दूसरी ओर राजकीय महाविद्यालय भलेई को बंद अथवा विलय किए जाने की आशंकाओं के विरोध में स्थानीय लोग सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने को मजबूर हुए। इसी बीच सिविल अस्पताल डलहौज़ी से दो वरिष्ठ चिकित्सकों के तबादले ने पूरे क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर नई चिंता खड़ी कर दी। इन घटनाओं ने आम जनता में शिक्षा और स्वास्थ्य के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल पैदा किए हैं।
उन्होंने कहा कि स्वाभाविक रूप से जनता को उम्मीद थी कि क्षेत्र का पूरा राजनीतिक नेतृत्व दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर इन मुद्दों पर एकजुट होगा। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जनता को यह संदेश मिल रहा है कि नेताओं की सबसे बड़ी प्राथमिकता बीडीसी अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और ज़िला परिषद अध्यक्ष-उपाध्यक्ष के चुनावों में राजनीतिक बढ़त हासिल करना है।
मनीष सरीन ने स्थानीय भाजपा विधायक पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि शिक्षा संस्थानों को बचाने और अस्पतालों में डॉक्टर बनाए रखने के लिए भी उतनी ही राजनीतिक सक्रियता दिखाई जाती, जितनी सत्ता के समीकरण साधने में दिखाई देती है, तो शायद आज विद्यार्थियों और मरीजों को अपने अधिकारों के लिए आवाज़ न उठानी पड़ती।
उन्होंने पूर्व कांग्रेस विधायक एवं पूर्व शिक्षा मंत्री पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि जिस क्षेत्र ने उन्हें शिक्षा विभाग का नेतृत्व करते देखा, उसी क्षेत्र में आज शिक्षा संस्थानों के भविष्य को लेकर लोग सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। जनता यह पूछ रही है कि वर्षों की राजनीतिक पकड़ का लाभ क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था को आखिर कितना मिला?
सरीन ने व्यंग्य करते हुए कहा, "ऐसा लगता है कि डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र में नया प्रशासनिक सिद्धांत लागू हो गया है—स्कूलों का विलय हो जाए तो कोई राजनीतिक आपातकाल नहीं, कॉलेज संकट में आ जाए तो कोई बेचैनी नहीं, अस्पताल से वरिष्ठ डॉक्टर चले जाएं तो कोई सर्वदलीय बैठक नहीं; लेकिन बीडीसी और ज़िला परिषद की कुर्सियों का चुनाव हो तो पूरा राजनीतिक तंत्र दिन-रात सक्रिय हो जाता है।"
उन्होंने कहा कि जनता अब भाषण नहीं, नेतृत्व की प्राथमिकताओं का हिसाब देख रही है। यदि भलेई कॉलेज बचाने के लिए विद्यार्थी सड़क पर हों, स्कूलों को बचाने के लिए अभिभावक संघर्ष कर रहे हों और अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता को लेकर लोग चिंतित हों, तो यह किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।
सरीन ने कहा कि सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं है कि शिक्षा और स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं; सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इन मुद्दों पर राजनीतिक तत्परता उतनी दिखाई नहीं देती, जितनी सत्ता-संतुलन के चुनावों में दिखाई देती है। लोकतंत्र में राजनीतिक पद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे जनता की सेवा का माध्यम हैं, स्वयं लक्ष्य नहीं।
उन्होंने मांग की कि डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र के स्कूलों और महाविद्यालयों से जुड़े सभी निर्णयों की स्थानीय जनप्रतिनिधियों और अभिभावकों के साथ समीक्षा की जाए, भलेई महाविद्यालय के भविष्य पर स्पष्ट नीति सार्वजनिक की जाए, सिविल अस्पताल डलहौज़ी में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए तथा शिक्षा और स्वास्थ्य को राजनीतिक प्राथमिकताओं में सर्वोच्च स्थान दिया जाए।
"डलहौज़ी की जनता अब यह नहीं पूछ रही कि बीडीसी और ज़िला परिषद की कुर्सी पर कौन बैठेगा; जनता यह पूछ रही है कि उसके बच्चे कहाँ पढ़ेंगे और उसके परिवार का इलाज कौन करेगा। जिस दिन राजनीति इस सवाल का जवाब देने लगेगी, उसी दिन जनता का विश्वास भी लौटेगा।"
Chamba, Chamba | Jul 12, 2026