
सहरसा तक फैला था शकरपुरा स्टेट का शासन, आज इतिहास के पन्नों में सिमटी विरासत
**बेगूसराय।** बखरी प्रखंड का शकरपुरा कभी फरकिया क्षेत्र की राजधानी के रूप में जाना जाता था। एक समय ऐसा था जब शकरपुरा स्टेट का प्रभाव दरभंगा महाराज की सीमा से लेकर पूर्व में कोपड़िया (वर्तमान सहरसा क्षेत्र) तक फैला हुआ था। स्थानीय बुजुर्ग आज भी गर्व से बताते हैं कि यहां से "14 कोस" तक शासन चलता था, हालांकि वास्तविक प्रशासनिक सीमा इससे कहीं अधिक विस्तृत थी।
## मनसबदारी में मिला था शकरपुरा का राज
इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, शकरपुरा स्टेट के अंतिम शासक राजा ललितेश्वर प्रसाद सिंह उर्फ गोपाल बाबू के पूर्वज मध्य प्रदेश के धार नगर से मुगल सम्राट शाहजहां के काल में इस क्षेत्र में आए थे। कहा जाता है कि शाहजहां ने उन्हें 14 कोस क्षेत्र का शासन मनसबदारी के रूप में प्रदान किया था। इस संबंध में सम्राट की मुहर और हस्ताक्षरयुक्त फारसी दस्तावेज भी मौजूद था, जिसे बाद में परिवार द्वारा राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली को सौंप दिया गया।
## फरकिया नाम की उत्पत्ति
लोकमान्यता के अनुसार, सम्राट अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल जब पूरे हिंदुस्तान की पैमाइश कर रहे थे, तब वे इस क्षेत्र में भी पहुंचे। घने जंगलों और दलदली भूमि के कारण वे इस इलाके की सही पैमाइश नहीं कर सके और इसे अलग (फरक) कर दिया। समय के साथ यही शब्द अपभ्रंश होकर "फरकिया" कहलाने लगा।
## जमींदारी उन्मूलन के साथ समाप्त हुआ राज
शकरपुरा स्टेट के अंतिम राजा गोपाल बाबू थे। वर्ष 1951 में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू होने के बाद स्टेट का प्रशासनिक नियंत्रण बिहार सरकार के अधीन आ गया। उस समय लगभग 2000 एकड़ भूमि गरीबों के बीच वितरित की गई। गोपाल बाबू ने किसानों को राहत देने के लिए मालगुजारी दर भी कम कर दी थी।
## शिक्षा और विकास में महत्वपूर्ण योगदान
शकरपुरा हाई स्कूल की स्थापना क्षेत्र के विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम थी। इसके संस्थापक उदित नारायण सिंह को शुरुआत में विरोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि कुछ लोगों का मानना था कि शिक्षा से लोग खेती-बाड़ी छोड़ देंगे। लेकिन उनके प्रयासों से विद्यालय की स्थापना हुई और क्षेत्र में शिक्षा का विस्तार हुआ।
इसके अलावा, शकरपुरा क्षेत्र में पहली बार टेलीफोन सुविधा लाने का श्रेय भी गोपाल बाबू को दिया जाता है। उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह (श्रीबाबू) से आग्रह कर सड़कों और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
## राजनीति में भी रहा परिवार का दबदबा
गोपाल बाबू के बड़े पुत्र कामेश्वर सिंह ने वर्ष 1967 में खगड़िया लोकसभा सीट से सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार जियालाल मंडल को भारी मतों से पराजित किया और मात्र 30 वर्ष की आयु में सांसद बनने का गौरव हासिल किया। बाद में वे राज्यसभा सदस्य भी बने।
परिवार के अन्य सदस्यों ने भी राजनीति, व्यवसाय और प्रशासनिक क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई। कृष्णवीर सिंह उर्फ फुचियाजी बेगूसराय जिला परिषद के सदस्य रह चुके हैं।
## शाही परिवार और वर्तमान पीढ़ी
गोपाल बाबू की पत्नी रानी अन्नपूर्णा देवी जमुई के प्रसिद्ध गिद्धौर राजघराने से थीं। उनके आठ पुत्र और एक पुत्री हुईं। परिवार के सदस्य आज देश-विदेश में विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत हैं। कुछ सदस्य मॉरीशस, स्विट्जरलैंड और अन्य देशों में भी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
## आज वीरानी की छाया
कभी जिस शकरपुरा स्टेट का प्रभाव 14 कोस से अधिक क्षेत्र में फैला था, आज वह अपनी पुरानी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। बखरी नगर परिषद क्षेत्र में शामिल शकरपुरा अब विकास की दौड़ में पीछे छूटता नजर आता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि आपसी खींचतान, राजनीतिक मतभेद और सामूहिक प्रयासों की कमी के कारण यह ऐतिहासिक गांव अपनी पुरानी चमक खो बैठा है।
फिर भी, यहां की भव्य हवेली, ऐतिहासिक विरासत और गौरवशाली अतीत आज भी इस क्षेत्र की समृद्ध कहानी बयां करते हैं। स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि एक दिन शकरपुरा फिर से अपनी ऐतिहासिक पहचान और गौरव को प्राप्त करेगा।