"ममता का कलंक और मानवीय मूल्यों का पतन: डीग जिले का बड़ेसरा कांड"
(रिपोर्ट- आकाश गुप्ता, भरतपुर)
भरतपुर। डीग जिले के जनूथर थाना क्षेत्र के बड़ेसरा गांव से सामने आया दोहरा हत्याकांड केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि समकालीन समाज के अंतःकरण को झकझोर देने वाली एक अत्यंत विदारक घटना है। जिस मां की गोद को बच्चों के लिए इस संसार का सबसे सुरक्षित आंचल माना जाता है, जब वही मां अवैध संबंधों के जाल में उलझकर अपने ही दो मासूम जुड़वां बेटों (विनय और विष्णु) की कातिल बन जाए, तो यह इंसानियत और मातृत्व के उस पवित्र रिश्ते पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगा देता है, जिसे सदियों से भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया जाता रहा है। इस जघन्य हत्याकांड ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब स्वार्थ और बेलगाम हवस मानवीय चेतना पर हावी हो जाती है, तब रिश्ते, मर्यादा और संवेदनाएं दम तोड़ देती हैं। प्रीति द्वारा अपने प्रेमी राजेश के साथ मिलकर अपनी ही संतान के प्राणों का सौदा करना यह दर्शाता है कि वासना और अंधाधुंध आधुनिकता की अंधी दौड़ ने किस प्रकार मानवीय संवेदनाओं को कुंद कर दिया है। बच्चों की मासूमियत भी उस क्रूर मां का दिल नहीं पसीज सकी, जिसने अपने गुनाह के उजागर होने के डर से अपने ही खून का गला घोंट दिया। भारतीय संस्कृति में युगों-युगों से रिश्तों की पवित्रता और पारिवारिक संस्कारों को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। शास्त्रों में जिस कलयुग की परिकल्पना नैतिक मूल्यों के क्षरण और रिश्तों के पतन के रूप में की गई थी, वैसी घटनाएं आज के जमाने की कड़वी और डरावनी हकीकत बन चुकी हैं। आज जब हम भौतिक प्रगति की दौड़ में आगे बढ़ रहे हैं, तब हमारे नैतिक ताने-बाने में दीमक की तरह कमजोरी घर करती जा रही है। विश्वास, नैतिकता और जिम्मेदारी की जगह स्वार्थ और क्षणिक सुख ने ले ली है, जिसके परिणामस्वरूप ऐसी अमानवीय घटनाएं समाज की नींव को हिलाकर रख देती हैं। यह घटना पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी की सफलता को तो दर्शाती ही है, जहां पुलिस ने चंद घंटों में ही इस दोहरे हत्याकांड का खुलासा कर आरोपियों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया, साथ ही यह समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। यह समय केवल अपराधियों को सजा देने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन करने का है। हमें यह सोचना होगा कि हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं? यदि परिवार और समाज के स्तर पर संस्कारों की इस गिरावट को नहीं रोका गया, तो न केवल मातृत्व लज्जित होता रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित और मानवीय समाज की कल्पना करना भी बेमानी हो जाएगा। समाज में बढ़ते नैतिक पतन और रिश्तों की इस अवनति को रोकने के लिए अब हमें पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर किसी विशेष बदलाव की जरूरत है?